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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बिरसा मुण्डा की पुण्यतिथि पर उन्हें किया नमन

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रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आदिवासियों के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले महान क्रांतिकारी जननायक बिरसा मुण्डा को उनकी पुण्यतिथि 9 जून के अवसर पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। मुख्यमंत्री ने बिरसा मुण्डा को नमन करते हुए कहा कि मुण्डा आदिवासी चेतना के प्रणेताओं में से एक थे। उन्होंने आदिवासियों को एकत्र कर जल, जंगल और जमीन के लिए आंदोलन किया। अकाल पीड़ितों की मदद की। उनके शौर्य और बलिदान की गाथा आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती हैें। मुख्यमंत्री ने कहा कि बिरसा मुण्डा ने हमें सिखाया कि प्रेरणादायी नेतृत्व होने पर सामूहिक इच्छाशक्ति, हथियारों की शक्ति पर भी भारी पड़ती है।

उम्र भर आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़े बिरसा मुंडा

भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा (Birsa Munda) को एक नायक के तौर पर देखा जाता है। उनकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ ही नहीं, बल्कि देश के शोषक समाज के खिलाफ भी थी। उन्होंने झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। आज उनकी जन्मतिथि है। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहातु गांव में हुआ था। वह मुंडा जाति से ताल्लुक रखते थे। घर की स्थिति खराब होने के कारण उन्हें अपने मामा के यहां भेज दिया गया था। उस समय क्रिस्चियन स्कूल में एडमिशन लेने के लिए इसाई धर्म अपनाना जरुरी हुआ करता था, इसलिए बिरसा ने अपना धर्म परिवर्तन कर अपना नाम बिरसा डेविड रख दिया, जो बाद में बिरसा दाउद हो गया था। लेकिन कुछ सालों बाद उन्होंने क्रिस्चियन स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि उस स्कूल में आदिवासी संस्कृति का मजाक बनाया जाता था, जो कि बिरसा मुंडा को बिल्कुल भी पसंद नहीं था। आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा 3 फरवरी 1900 को बिरसा मुंडा को धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ ही महीने बाद 25 वर्ष की उम्र में 9 जून को बीमारी की वजह से जेल में ही बिरसा का निधन हो गया। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा जाता है और उनके बलिदान को याद किया जाता है।

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हर तरह के शोषण के खिलाफ थे बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा एक समाज सेवक थे। उन्होंने अंग्रेज़ों से तो लोहा लिया, साथ ही देश में आदिवासियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। वह एक शोषण मुक्त समाज चाहते थे, जिसमें वंचित व आदिवासियों को उनके अधिकार अधिकार प्राप्त हो। सिर्फ 19 वर्ष की आयु में उन्होंने मुंडा जाति के आदिवासियों को एकजुट किया और अंग्रेज़ों से ‘लगान माफी’ के लिए आंदोलन किया, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 1898 में छोटानागपुर में अंग्रेज़ी सेना को हराने के बाद कई लोगों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई। छोटानागपुर के इस विद्रोह में सैकड़ों लोग शहीद हुए। 1895 में बिरसा मुंडा ने अंग्रेज़ों के खिलाफ घोषणा की और कहा, ‘हम ब्रिटिश शासन तन्त्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते है और कभी अंग्रेज नियमो का पालन नही करेंगे।’ वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महान नायक के रूप में उभरे। बिरसा मुंडा (Birsa Munda) के नेतृत्व में आदिवासियों ने मुंडाओं के महान आंदोलन ‘उलगुलान’ को अंजाम दिया। वह महज 25 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए थे। अपने नेतृत्व के कारण मुंडा हमेशा के लिए अमर हो गए। उन्हें उनके समुदाय के लोगों द्वारा भगवान का दर्जा दिया जाता है और आज भी गर्व के उन्हें याद किया जाता है। उनका अदम्य साहस हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है। बघेल ने कहा कि आदिवासियों को उनका अधिकार और स्वाभिमान दिलाना ही बिरसा मुंडा जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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