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पुरातन पार्टी को रीढ़विहीन करके आख़िरकार विकास पुरुष मंत्री बन गए ? ~ राजकमल पांडे

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०मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी जी ने लिखा था कि राजनीति का ऐसा चरित्र है जिसका कोई चरित्र ही नही है। अपितु इस दौर में मेरी निजी राय यह कह है कि अब वह राजनीति ही है जहाँ सारे चरित्रवानों का डेरा जमा है। शेष राजनीति पर टिप्पणी करने वाले लोग नेताओं के लिहाज़ से चरित्ररहित हैं।

आज मनचाहा सब्जी खाने की उत्सुकता बस सब्जी लेने हेतु बाज़ार की ओर निकल पड़ा, और मेरी माताश्री भी काफ़ी दिनों से कह रह रहीं थी कि जाओ कहीं घूम-घाम आओ, होली से घर में क़ैद हो सो घूमने के ईरादे से भी आज निकल पड़ा। शहर की हालत तो बढ़िया है, सड़क निर्माण लगभग पूर्ण हो गया, बहादुर शाह की कार्यक्षमता के बलबूते अब बीच-बीच में पौधे लगाने की तैयारी जोर-शोर से हो रही है। लाइट-व्हाइट लग चुके हैं। नाबालिक फर्राटेदार वाहन चालकों की चलानी कार्यवाही भी जोर पकड़ रहा है। शासन के मंशानुरूप शराबियों की लाइन शराबखाने में लगी हुई थी। व इस सब के अतिरिक्त जो फुर्सत में थे उनके जुबान में भोपालताल से मंत्री पद लेकर लौटे पुरूष का ज़िक्र था, मैं इन सब बातों और लोगों के आपसी राजनीतिक चर्चाओं से बचता-बचाता हुआ किसी क़दर सब्जी मंडी पहुँचा। मंडी पहुँच कर सब्जी का मोलभाव करते-करते शाम हो गया, ऐसी मटमैली रौशनी आँखों के सामने छाने लगा जब सूरज ढलने के लिए आतुर होता तो है, अपितु पूर्ण रूप से ढला नही होता है। सब्जी ख़रीदा और एक हाथ मे सब्जी का झोला दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए कस्बाई के पगडंडी मार्ग से घर की ओर निकल पड़ा, घर तक जाने वाली सड़क पकड़ते-पकड़ते शाम हो चुका था। रास्ते पर सन्नाटा सोया हुआ था या यूँ कहिए नासमझ जानवरों से लेकर समझदार इंसान तक घरों में क़ैद हो चुके थे। रास्ते में चलते-चलते अचानक एक आवाज़ गूँजी ‘‘अरे ओ कविराज तनिक मेरा भी हाल लेते जाओ’’ मैं चकित होकर यहाँ-वहाँ नज़र घूमाने लगा कोई नही दिखा तो फिर आगे कि ओर बढ़ा। पुनः वही आवाज़ गूँजी ‘‘अरे ओ कविराज यहाँ-वहाँ क्या देख रहे हो नीचे देखो, नीचे, मैं हूँ ‘‘विकास’’ ! नीचे देखते ही मैं ठहर गया, हाथ से सब्जी का झोला छूट गया, मानो सब्जी सड़क में बिखर जाने का भी होश खो गया। और एक लम्बी साँस खींचते हुए ‘‘विकास’’ से पूँछा क्यों भई विकास तुम तो अपने पुरुष के साथ भोपालताल रहने चले गए थे न बगला, गाड़ी, मोटर और आश्वासन से लदे जीवन जीने चले गए थे, फिर वापसी की वज़ह। ‘‘कविराज नेताओं के आश्वासन, उनका बंगला, गाड़ी, मोटर सब मिथ्या है, दरअसल मुझे तो रहना अपने शहर में चाहिए था। और मैं तो पुरुष के मंत्री पद दिलाने हेतु भोपालताल में पसरा हुआ था, व मेरा भोपालताल में जाना पुरुष के व्यक्तित्व में निखार लाना था। मेरा जलवा देखो कविराज ! मैंने पुरातन पार्टी को अनूपपुर विधानसभा से रीढ़विहीन कर दिया, सुनो ‘‘कविराज मेरा काम नेताओं के जुबान में घूमना फिरना बस नही है, कभी-कभी मैं बग़ावती तेवर धारण करके नेताओं को ही धराशाई कर देता हूँ।’’ और अगर आप सच मानो तो मंत्री पद मेरी ही प्राप्ति का एक उद्देश्य मात्र है।’’ अरे विकास भइये ! तुमको तो यह ज्ञात होगा कि वह पुरुष मात्र हैं ‘‘विकास-पुरुष’’ तुमसे मिलकर बने हैं। और तुमको नही मालूम कि अभी ताज़ा-ताज़ा एक काम पार्टियों व ग़ैर पार्टियो के कुछ हड़ताली बाबाओं ने तुम्हें मुक़ाम तक पहुंचाने हेतु 47 गाँव को जोड़ने वाली सड़क का फ़ीता काटा है, पन्द्रह-बीस दिन और रुक जाओ तुम गली-गली, चौराहे-दर-चौराहे इश्तहारों में चिपके मिलोगे, बैनर, पोस्टर, कटआउट में लटके व लाउडस्पीकरों में गूँजते हुए मिलोगे। और न जाने कितने आश्वासन के सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, नाली, गली, कुआं, तालाब, घरों के राजनीतिक में परम्परगत लटकते हुए काम आओगे। विकास भइये, विकास पुरुष को पूरे भारत का मंत्री पद दे दो तब भी वह अमेरिका का विदेश मंत्री बनने की लालसा में अड़े रहेंगे। दरअसल यह गलती कांग्रेस की पूर्व सांसद की देन है, जिन्होंने अपने कार्यकाल के रहते हुए विकास पुरुष अंतिम साँस तक ऊर्जा मंत्री बने रहने का प्रस्ताव संसद में पारित न करवा सकीं। जिसका हर्जाना आज मौजूदा कांग्रेसी कार्यकर्ता भर रहे हैं। वैसे दिग्गिराजा चाहते तो 52 विभागों का बंटवारा कर 104 विभाग बनाते और 104 विभागों का मंत्री पद पर विकास पुरूष और ज्योतिरादित्य सिंधिया को शपथ दिलाकर हे नाथ के 90 अंश से गिरी सरकार को 60 अंश में ला टिकाते। कांग्रेस में गणितज्ञ तो हैं, पर ज़्यादातर चौथी जमात के हैं, उससे आगे की उनसे गणितज्ञगिरी हुई नही ? पढ़े-लिखे युवाओं का तो राजनीति में प्रवेश वर्जित हो जाना चाहिए, क्योंकि आज के पढ़े-लिखे युवा राजनीति के लिए धीमा ज़हर हैं या यूँ कहें पंडोर छाप का झुंझाने वाला चलता फिरता ज़हर है। विकास पुरुष अगर आज यह कहें की उन्होंने मंत्री पद की लालसा में कांग्रेस नही छोड़ा है, तो भाजपा में मंत्री पद को स्वीकार क्यों किया। और अगर यह कहें कि उन्हें वरिष्ठ नेता व विधायक होने का बराबर सम्मान नही मिला, तो राजनीति से इस्तीफा देकर कांग्रेस के सलाहकार क्यों नही बन गए। दरअसल मुख्य बात यह है कि विकास पुरुष कांग्रेस से चुनाव लड़ते वक्त ही स्वयं से यह तय कर लिए थे कि चुनाव जीतूँगा तो मंत्री पद अवश्य लूँगा क्योंकि राजनीति के अंतिम पड़ाव में वह मुफ़लिसी में दम नही तोड़ना चाहते थे। ये और बात है कि उनके समर्थक व कार्यकर्ताओं ने विकास पुरुष के साथ कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में सदस्यता ले लिया, बशर्ते विकास पुरुष के बाद वह कार्यकर्ता भाजपा में अपनी ज़मीन तलाशने में लग जाएँगे। बात एक दम साफ़ है कि जिस अठन्नी के अस्तित्व को भारत तक ने अपने कोष व चलन से बाहर कर दिया, भला ऐसे अठन्नी की व्यक्तित्व बनाकर भी पद मिले तो क्या वह पद स्वीकारने योग्य है ? विकास भइये ! मैं तो कहता हूँ तुम अपना गढ्ढानुमा सीना और गहरा कर लो अभी अनूपपुर विधानसभा उपचुनाव में बहुत नेता गोता लगाने आएँगे। विकास थोड़ा झिझकते हुए गढ्ढे में ही सिर हिलाया और बोला। ‘‘कविराज यह सब तो राजनीति में जन्मजन्मांतर से होता आ रहा है, नेताओं को पद दिलाने तक ही मैं सीमित हूँ पूर्ण कभी हो ही नही सकता और न किसी नेता में इतनी हिमाक़त की मुझे सम्पूर्ण रूप से विकसित कर सके।’’ ठीक है विकास भइये, तुम गढ्ढे में संतुष्ट रहो, नेताओं के आश्वासन में तैयरों, जनता को बेवकूफ बनाओ, इश्तहारों में रहो, बैनर, पोस्टर, कटआउट में लटके रहो। यह कहते हुए सड़क में अपनी बिखरे हुए सब्जी को इकट्ठा किया झोले में भरा और घर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में दुष्यंत बाबू का एक शेर याद आ गया कि

‘‘जाने किस किस का ख़याल आया है
इस समुंदर में उबाल आया है
एक बच्चा था हवा का झोंका
साफ़ पानी को खँगाल आया है’’
यह दोहराते हुए मुस्कुराया और घर की ओर चल पड़ा।

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शेष भाग आगामी अंक में !

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