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प्रक्रिया का पालन करें पंचायतें, टेंडर से हो खरीदी फर्जी बिल पर लगेगा अंकुश…….यदुवंश दुबे ने व्यक्त किये अपने विचार@आसुतोष सिंह

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पंचायतो ने मचा रखा है तांडव

इंट्रो- बेंडर बनाकर खरीदी की जाने का अधिकार म.प्र. शासन द्वारा ग्राम पंचायतों कोे प्राप्त है। पंचायतें निर्माण कार्यों सहित जरुरत की सामग्री वेंडरों से भुगतान कर ले रहीं है जिनकी संख्या कुछ भी हो सकती है। वेंडरों को बनाये जाने के बाद पारदर्शिता व नियंत्रण नही होने से लगातार फर्जी बिल, राशि का आहरण व भ्रष्टाचार की बातें प्रायः सामने आती है। पंचायतें प्रक्रिया का पालन कर टेंडर प्रक्रिया से खरीदी करें तो शासकीय राशि का दुरुपयोग के साथ गुणवत्ता मे सुधार संभव है।

अनूपपुर। म.प्र. पंचायत राज्य एवं ग्राम स्वराज अधिनियम अधिनियम 1993 के तहत जिला, जनपद व ग्राम पंचायत आवस्यक सामग्री खरीदी के लिये सेवा प्रदान करने वाली संस्था का रजिट्रेषन कर वेंडर आईडी जारी करती है जिसकें माध्यम से खरीदी की गई वस्तु का भुगतान राज्य सरकार से आवंटित पैसों द्वारा बैंक खातों के माध्यम से किया जाता है। प्रायः देखा गया है कि पंचायतों मे लगाये गये बिल शासकीय नियमों के अनुरुप नही होते जो फर्जी वाड़ें की तरफ इशारा करते है। अकसर ग्राम पंचायत के अधीन कर्मचारी अपने करीबी को वेंडर बनाकर शासकीय राशि के दुरुपयोग मे जुट जाते है यदि ग्राम स्वराज अधिनियम के नियमानुसार निविदा आमंत्रित कर आवस्यक सामान ग्राम पंचायते खरीदें तो हो रहे फर्जी वाड़े पर अंकुश ही नही सामान की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। उक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार यदुवंश दुबे ने व्यक्त किया है।

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फर्जी बिलों पर लगेगी लगाम

ग्राम पंचायतों के माध्यम से खरीदी की जाने वाली सामाग्री का भुगतान लाखों करोड़ों का प्रति वित्तीय वर्ष मे किया जाता है। प्रायः देखा गया है कि खरीदी गई सामग्री के दर पर नियंत्रण नही होता और न ही गुणवत्ता का कोई मापदण्ड तय है। साथ ही टिन नंबर, जीएसटी, फर्म, फोन नंबर, पता आदि य तो पूर्णतः लगे बिलों मे भरे नही होते य इन पर गंभीर त्रुटियां अकित रहती है जिनकी जांच बृहद पैमाने पर न होने से फर्जीवाड़े को बल मिलता है। यदि निविदा आंमंत्रित कर सामग्री खरीदी जायेगी तब दर्शाई गई उक्त बातें स्वतः ही प्रमाणित हो जायेगी।

नियम का हो पालन

म.प्र. पंचायत राज्य एवं ग्राम स्वराज अधिनियम अधिनियम 1993 के तहत जहां ग्राम पंचायतों को आसीमित अधिकार दिये गये है तो वहीं पारदर्शिता बनाये रखने के लिये भी गाईडलाईन जारी की गई है। नियमों का पालन करते हुये शासकीय राशि का उपयोग पंचायत के विकास मे खर्च करना त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था का मूल उद्द्देश्य है। निविदा आमंत्रण का माध्यम चाहे जो हो किन्तु खरीदी की जाने वाली सामग्री की दर पहले ही तय हो जाने से राशि के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने मे सक्षम रहेगी। वैसे तो पंचायतों को नियमावली पालन करने का निर्देश दिया जाता है किन्तु वेंडर आईडी उन पर होने वाले भुगतान की जांच का दायित्व जिन पर है वे पालन कराने मे अब तक अक्षम साबित होते प्रतीत होते है।

वेंडर की रहती है ठेकेदारी

अब तक किये गये कार्य लगाये गये बिल और हुये भुगतान का आंकलन किया जाये तब यह समझना आसान हो जाता है कि वेंडर ग्राम पंचायतों मे ठेकेदारी करते है जो नियम विरुद्ध है। ग्राम पंचायते निर्माण एजेंसी होती है जिनका वित्तीय पोषण राज्य सरकारें प्रदान करती है। हितग्राही मूलक योजना नरेगा और पंच परमेश्वर के तहत किये जाने वाले निर्माण मे कहने को वेंडर किन्तु भौतिक रुप से ठेकेदार का ही कमान होता है। ग्राम पंचायतों के सचिव, रोजगार सहायक, पंच, सरपंच पर इन वेंडरों का राज्य अलिखित रुप से कायम रहता है यही वजह है कि वेेंडर मनमानी तरीके से बिलो की नस्तियां पंचायतों मे लगाकर नियम विरुद्ध भुगतान लेने के लिये पंचायत पर दबाव बनाते है।

इनका कहना है

मटेरियल सप्लाई और उसके भुगतान की प्रक्रिया खरीदी से पहले स्पष्ट हो जाने पर भ्रष्टाचार की संभावना को कम कर सकता है। निष्चित ही नियमानुरुप निविदा प्रक्रिया का पालन श्रेष्ठ है।

हीरा सिह श्याम
जनपद अध्यक्ष पुष्पराजगढ़

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