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जनता के मासूम कन्धो पर चुनावी बोझ ? ( राजकमल पांडे आजाद )

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हास्य व्यंग्य

आज मैं घर से निकला जरूर था, मगर मन मे थोड़ा हिचकिचाहट था। वो इसलिए कि कहीं कोई चुनावी महासमर का दुर्योधन न गले पड़ जाए। नही उसके दिल को दिलासा देते-देते झूठ की पूरी पराकाष्ठा लांगना पड़ जाता। वैसे मैं झूठ बोलने का आदि नही हूँ, अगर मेरे झूठ बोलने से किसी का घर भी बसने वाला हो तो मेरे सच से पहले ही उजड़ जायेगा। किसी कदर नेताओं के नजरों से बचते-बचाते मैं अपने मित्र पाईजी! के दुकान में जा पहुंचा। मेरे पहुंचने के पूर्व ही वहां एक आदमी जो कन्धे में भगवा गमझा टांके हुए पाईजी! का सर खाये जा रहा था। उस आदमी के सामने के बाल कुछ ऐसे ही गप्प हांकने की वजह से झड़े हुए थे। और कुछ दाढ़ी जो खैरहन धान के तरह चेहरे में उगे आये थे। एक लबादा बदन में टांका हुए था, जिससे वह चुनाव प्रचारी मालुम पड़ रहे थे। मैं ईश्वर को मन ही मन बुदबुदाआ और बोला कहाँ फंसा दिया आपने मुझे।
पाईजी! मुझे देखते ही कुर्सी से उठते हुए नमस्कार किया और मेरे ओर सरकते हुए आये कांन में लगकर दबी जुबान से बोले अच्छा हुआ आप आ गए। पाईजी! मुझे देखकर खुश थे, तो वहीं मैं उस भगवाधारी को देखकर हिचकिचा रहा था। इसलिए नही की मुझे ऐसे लोगो से चिढ़ है, बल्कि अलूल-जलूल बात करने वालों से मैं बेहद परहेज करता हूँ। फिर भी पाईजी! से बात करने के लिहाज से कुर्सी खिसका कर बैठ ही गया। जैसे ही मैं कुर्सी पर विराजमान हुआ। पाईजी! ने चुनावी सुर छेड़ दिया और कहा।
लेखक महोदय! ये जो भगवाधारी बाबू आपके सामने बैठे हैं, इनका कहना है कि इनके लोकप्रिय विधायक जो इस बार पुनः चुनाव लड़ रहे हैं वह बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी व बहुत गरीब विधायक हैं।
हां पाईजी! हो सकते हैं जब एक गैर मैट्रिक पास आदमी देश चला सकता है और बड़े-बड़े बौद्धिकवादी उनके आगे नतमस्तक हैं, तो कुछ भी सम्भव है। और पाईजी! जैसे ही चुनाव आता है नेताओं का व्यक्तित्व स्वतः ही आकर्षक हो जाता है। वैसे ये महाशय अपने विधायक की गरीबी का आंकलन स्वयं कर रहे हैं, या वास्तव में वो गरीब हैं।
पाईजी! ने ऐसे मुँह बिचकाया जैसे जीभ में ईमली दबा रखी हो, तभी मैं समझ गया ये भगवाधारी जनता को गुमराह करने निकला हैं। मैंने उनकी ओर सवालों के तीर छोड़े और पूंछा।
क्यों भई तुम लोग इतना ज्ञान लाते कहाँ से हो। तुम जरा ये बताओ अनूपपुर को जिला बनें 15 बरस हो गए आज तक एक ढंग का रोड तो बना नही पाए हो। एक बार आपके विधायक जी! से हमारे एक कनिष्ठ मित्र ने चर्चा किया था कि अनूपपुर में “कृषि रिसर्च सेन्टर” होना चाहिए तो आपके विधायक ने ऐसे सर हिलाकर हां किया जैसे बस कल ही उस ‘रिसर्च सेन्टर’ की नींव डाल दिया जाएगा। आपके शासन काल मे हुआ क्या है, जरा बताएँगे। आपकी सरकार जगह-जगह के नाम बदलने और न्यायपालिका के आदेश को पटखनी देने के अलावा किया क्या है?
वह भगवाधारी महाशय ऐसे झल्लाये और मेरी ओर इस कदर देखे जैसे सरकार गिराने की पूरी साजिश से आया हूँ। और निगाहें तरेरते हुए बोले, आप क्या जानो लेखक महोदय! राजनीति करने के लिए कई विधाओं में महारत हासिल होना चाहिए। राजनीति में चाणक्य बनना होता है।
मैंने कहा अच्छा तो आप ये भी बता दीजिए कि किसी क्षेत्र के विकास की बलि चढ़ाने के लिए आपके विधायक और पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष जिनके जोड़ी आज राजा विक्रमादित्य और बेताल जैसे है। उन्होंने किस विधा को उपयोग में लाकर समूचा विकास अपने मटके जैसे पेट मे समेट लिया है। और चाणक्य का ज्ञान तब बाहर आता है, जब चन्द्रगुप्त मौर्य रास्ते में पड़े मिल जाये। पाईजी! खिलखिलाते हुए ताली पीटा और बोले इसका जबाब इन महाशय के पास नही मिलेगा।
तभी उन्होंने अपने कन्धों से गमझा झटका और बोले लेखक महोदय! हमारे विधायक जी! ने इतना विकास की गंगा बहाया है कि-“तभी मैंने उन महाशय की बात को वहीं विश्राम करते हुए बोला कि समूचा विकास का पानी विधायक के कमरे में भर गया। पाईजी! टेबल में हाथ पटका और जोर से हंसे। और इधर महाशय के कपाल की नशें तमतमाये हुए था। और बोल उठे लेखक महोदय! आप छोटी मुँह बड़ी बात नही करते हैं। अब आप ये बताइये जो अखबार नबीश इन नेताओं के स्वागत कक्ष में खड़े रहते हैं, कुछ पाने की आशा में। तब आपका कलम नही चलता है, और हम नेताओं और प्रचारकों के विरुद्ध आपका कलम आग उगलता है। आप इन अखबार नबीशों के खिलाफ क्यों नही लिखते हैं।
मैंने उस महाशय की बात को गंभीरता से लेते हुए बोला आप जो कह रहे हैं वो एक दम सही है। पर मैं समय-समय पर सब को उनकी गलत दिशा में प्रवेश होते देखता हूँ तो आगाह कर देता हूँ। अपितु आप ये बताईये अनूपपुर पिछड़ा हुआ और काफी संकीर्ण क्षेत्र है, यहां और राज्यो व जिले के मुताबिक पहले विकास होना चाहिए था। विकास की गाथा लिखने का जितना दायित्व आप अखबार नबीशों का माथे मढ़ते हैं, उतना ही अगर आपके जय चन्दो को समझ मे आ जाये तो। आज अनूपपुर का विकास सातवे आसमान पर होता। मैं मानता हूँ कि अखबार नबीशों को ऐसी विषम परिस्थितियों में जन-जीवन की आवाज बुलन्द करना चाहिए। और आप मेरी क्या बात करते हैं, मैं तो निरायुध इंसान हूँ बस कभी-कभी जनता के मर्म में आघात होता है, तो कलम उठा लेता हूँ।
वह भगवाधारी महाशय मेरे जबाब से थोड़ा असंतुष्ट थे, क्योंकि वो पार्टी भक्त थे। तो मैंने कहा सुनिए महाशय समाचार-पत्र का प्रकाशन आधुनिक युग की नई विद्या है, और प्रभावपूर्ण शक्ति संयोजन में वह अपना स्थान बना चुका है। इसलिए आज के युग मे इसे चौथा सत्ता के नाम से पदस्थ किया गया है। सह्योगत्मक कोई अखबार नबीश अपनी कलम को सियासत के चौखट में गिरवी रख आये तो क्या उसके लिए समूचा लेखनीय जगत दोष में डूब जायेगा। नही न मगर आपके नेताई जमात में सब के सब ऐसे ही हैं, विधायक, सांसद, मंत्री, मनिस्टर सब के सब कुर्सी पाते ही जनता के दुःख-दर्द उनके लिए परिहास का हिस्सा मात्र रह जाता है, ऐसा क्यों ? जनता के मासूम कन्धो में आप लोग जो ये चुनाव का बोझ डालकर कर अपनी चवनी चलाते हैं, उसका क्या।
उस महाशय ने मेरी बातों को काटते हुए बोले लेखक महोदय! आप कुछ भी कहें इस बार के चुनाव में हमारे लाल सब पर भारी पड़ेंगे। जनता के सबसे लोकप्रिय विधायक में से एक हैं हमारे विधायक जी!
मैंने कहा- महाशय मुझे लगता है इस बार की चुनाव में सत्ताधीश मुफ़्त अफ़ीम बांट रही है, या आपने अपने आंख में केवल लोकप्रियता का चश्मा टंगा रखा है। आपके विधायक जीतेंगे कहाँ से न तो आज तक सब्जी मंडी के विस्तार में वह अपना योगदान दिया, न ब्रिज के निर्माण में अपना कोई योगदान दिया, शहर के विस्तार हेतु उन्होंने प्रशासन से जाकर बात तक नही किया, लोगो का रास्ता बन्द करने के सिवा आपके विधायक ने क्या किया है। जिसे स्टार प्रचारक के रूप में आपके विक्रमादित्य ने बेताल को पीठ में लाद लिया है, उसी बेताल की वजह से आज शहर का विकास अवरुद्ध है। आपके बेताल ने बाईपास रोड में अड़ंगा लगाया, ब्रिज निर्माण में अड़ंगा लगाया, सब्जी मण्डी का जब विस्तार हो रहा था, तो उसी बेताल ने एसडीएम तक से जा भिड़े थे। चन्द मुट्ठी भर लोग जनता नही है कि चार लोगों को खुश रखने की वजह से आप समूचे विकास की हत्या पर आमादा हो जायेंगे। रही बात यहां के अखबार नबीशों के प्रतिभाओं की तो मुझे उनसे कभी कुछ लेना-देना था, ही नही मैं ठहर कवि ह्रदय का इंसान जो बोलता हूं कविताओं के माध्यम से ही बोलता हूं।
उस महाशय ने अपनी खैरहन दाढ़ी पर हांथ फेरा और बोले लेखक महोदय! कुछ भी हो मगर जीत हमारे लाल की ही होगी और उठकर भागना मुनासिब समझा।
मैंने उन्हें रोका और कहा मेरा एक शेर तो सुनते जाओ महाशय कि
“किन-किन विधियों में उलझी है
तेरी लाख-लाख प्रतिभाएं,
जिसे तुम अमृत समझ कर पीर रहे हो
कल कहीं वह अमृत-विष न हो जाये”
जिस तेजी से वह भगवाधारी महाशय भागे जैसे इंडिया के किसी बैट्समैन नें पाकिस्तान के बॉलर के बाल को बाउंड्री लगा दिया हो। पाईजी! मन भर सांस लिया। और बोले
लेखक महोदय! आपने इन्हें इतना क्यों लताड़ा है।
अरे पाईजी! मैं जानता हूँ कि पत्रकार की उंगलियां समाज के नब्ज में होता है, वह समाज की बीमारियों का विशेषज्ञ कहा जाता है। इतिहास साक्षी है पाईजी! कि विश्व के मानव समाज मे जितनी तब्दीलियां हुई हैं, उनमें कलम की भूमिका प्रमुख थी। पर ये बात यहां के कुछ अखबार नबीशों को समझ में न आये तो मैं क्या कर सकता हूँ। उसके बाबजूद ये बात अगर हम कहें तो बनता है, इनके जैसे सत्ता के सहचर जो पार्टी के झंडा बस ढोते हैं। ये कलम के प्रतिभाओं को प्रश्न चिन्ह की कटघरों में खड़े करेंगे। जिनके घर खुद शीशे के हैं, वह दूसरे के घर पत्थर क्यों मारते हैं। इसलिए इनको लताड़ना जरूरी था ताकि किसी ऐरे-गैरे कलमवीर तक से भिड़ने से हिचकिचाहट महसूस हो।
अच्छा लेखक महोदय! चलता हूँ चुनावी माहौल की वजह से व्यापार भी ढप्प है। और ठण्डी भी बढ़ रहा है, स्वेटर लाना भूल गया हूं। चलिये आपको भी वहाँ तक छोड़ दूंगा। पाईजी! के गाड़ी में बैठकर घर की तरफ कूच किया। रास्ते की वार्तालाप आगामी अंक में।

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