# मुख्यमंत्री सीएम शिवराज सिंह का हुआ आगमन ##

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टिकिट इन्हें ही मिलेगी से लेकर यही जीतेगा तक का सफर (आशुतोष सिंह)

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जैसे जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा था टिकट के लिए नेताओं का दौड़ भोपाल दिल्ली में बैठे आकाओं कि तरफ चरण वंदन के लिए जारी रहा …. इधर राजनैतिक चर्चाओं का बाजार गर्म होता रहा लोग चटकारों के साथ मजे ले रहे थे लें भी क्यों न् चुनाव बाद तो सिर्फ नेताओं के ही मजे होते हैं ……….।
यह सिलसिला अनवरत जारी रहा ऐसी कोई जगह नहीं रही जहां पर राजनैतिक अटकलों, चर्चाओं, अफवाहों वा रायता फैलाने की बातें न होती रही हों…. कुछ ज्ञानचंद – रायचंद की पूंछ-परख अचानक चुनावी सरगर्मी में बढ़ गई थी औऱ वे इससे गदगद भी हुए थे…….
इधर कुछ वजूद खो चुके राजनैतिक बंटाधारी मैनेजरों ने भी अभी तक हार नहीं मानी थी………..।
इनके अनुभवों का भी कोई उम्मीदवार लाभ लिया …….?
जब इनके पास कोई नहीं आया था तब किसी उम्मीदवार कि तलाश में जुट गये थे औऱ उसकी मृत परायण नेतागिरी की भावना को उभारने में लग गये थे…. उसे यह कह कर उकसाया गया कि जब लल्लू – पंजू चुनाव लड़ रहें हैं तो आप क्यों नहीं…….?
आप तो प्रबल दावेदारों में से रहे हैं, आपकी पकड़ जनता में है, आपको पूरा क्षेत्र जानता है, आप तो आसानी से चुनाव जीत सकते हैं…..!
बस अब क्या इन मैनेजरों की दाल,रोटी, पान, चाय, चखना अब इस नेता के हवाले…. ।
क्या है ना कि जब बात चल पड़ती है तो लोग सहज भाव से राजनैतिक चर्चाओं में भाग ले ही लेते हैं अपने-अपने तरीके से पसंदीदा उम्मीदवारों वा पार्टियों के बारे में बताने में मशगूल हो जाते हैं, कुछ मंडल, मंडलम वाले लोग अनुभव की खान लिए रायता बघारते मिल ही जाते हैं….
पूरे चुनाव में नेता समस्याओं के संबंध में चर्चा कम और प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों के बारे में खुलकर बातें करते रहे इधर जो समर्थक रहे उनकी बातें ऐसी थीं कि “”बेशर्म का फूल भी शर्मा जाए”” जो आलोचक थे वे पूरे इतिहास का क्रमबद्ध ब्यौरा दे रहे थे ।
ये वो लोग हैं जो जानते हैं कि राजनीति का आर्कषण लोगों के दिल और दिमाग पर छाया रहता है इसकी चर्चा के बिना कुछ लोगों का खाना हजम ही नहीं होता ये ऐसे लोग थे जो बाजार में राजनीतिक वातावरण को हर समय गर्माये रखे हुए थे और उम्मीदवारों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा भी बनाये रखने में कामयाब रहे अपनी होशियारी वा अक्लमंदी का पूरा शुल्क भी इन्होंने वसूल लिया है, चाय नास्ता का जुगाड़ यंही से चलता रहा है
उम्मीदवार भी जानते थे कि हमें पलीता लगाया जा रहा है पर वे सुर्खियों में बने रहने का कोई अवसर नहीं छोडऩा चाहते थे उनका मानना था कि इन्ही लोगों से हम बोटरों के दिमाग मे जगह बना पाये हैं सोशल मीडिया में जो खबरें लगातार देखते हैं उनका हम विश्लेषण करें तब उम्मीदवारों की चर्चा ज्यादा होती है कुछ ने तो भाजपा औऱ कांग्रेस के अलावा अपने चहेते उम्मीदवारों की जीत ही फायनल कर दी है…।
ये वही लोग हैं जो पहले कह रहे थे “” टिकट तो इन्हें ही मिलेगी”” और अब कह रहे हैं “”जीतेंगे ये ही”” उम्मीदवार के रिश्तेदारों की गम्भीरता सागर की गहराई का सीना ही चीर चुकी है…….
जीत किसे मिलेगी…. यह तो 11 को मतगणना के बाद ही पता चलेगा पर रिश्तेदारों के हाव-भाव देखते ही बनते हैं जैसे उन्हें ही जीत मिल रही है कथित रिश्तेदार तो इन दिनों अपनी गंभीर मुद्रा और चेष्टाओं से लोगों का खिलौना बने हुए हैं लोग ऐसे अवसर का मजा लेने से नही चूकते और पूंछ ही लेते हैं कि क्या हुआ कितने बोटों से जीत रहे हैं ….?
वे इस तरह से मुंह बनाकर बताते हैं कि जिताने की जबावदारी इनके अवसर वादी कंधों पर ही टिकी हुई थी इनकी पाखंडी व्यस्तता देखते ही बनती थी एकाद दो ऐसे भी थे जो चिंता से काम पर लगे हुऐ थे पर अधिकांश “”काम के ना काज के दुश्मन अनाज के”” वाले रहे हैं पर उनके बड़बोले पन का लोग इस चुनावी समर में बेजा आनंद लिए हैं और ये सब चाय नास्ता और पान के बिना अधूरा है और इसका खर्चा ये कथित रिस्तेदार ही उठाते रहे हैं और पाई-पाई का हिसाब सैकड़ों में अपने रिस्तेदार उम्मीदवार से वसूल भी लिया है ।
चुनावी माहौल में जिन्हें कुछ खाने का मन रहा है एक बार पूछ लिए क्या हाल है…….?
बस क्या है लुत्फ उठाये मन भर खाए ध्यान भी रखा खाते समय हाँ में हाँ मिलाना है …. जब तक खा रहे हैं।
अब तो बोटों का अंतर बताया जा रहा है हर कोई जीत के करीब है बस एक बात उसे नही पता आखिर कितने मतों के अंतर से जीतेगा ।
सिर्फ इसलिए हर पार्टी, उम्मीदवार, नेता, अपने कार्यकर्ताओं या चमचों के आंकलन पर भरोसा किये हुए है स्वक्ष विश्लेष्ण कर्ताओं से दूरी अभी भी बनी हुई है।

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