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‘‘जो बोया था वही काटा भी है?’’ विशिष्ट अथित लेखक ‘राजकमल पांडे ‘आजाद’

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‘‘जो बोया था वही काटा भी है?’’

-०राजकमल पांडे ‘आजाद’

कविता में मन का अनुराग लिखते-लिखते जब कवि सियासत के गलियारों में उठे बेसुरे राग के विरुद्ध लिखने लगे तो कवि के लोकप्रिय जनों के मस्तिष्क में प्रश्न चिन्ह खड़े होने लगते हैं। खैर ये तो अपनी बात है; अपितु बात हम सत्ता के मुग्धों का करें जिनकी शक्ल व कार्यक्षमतानुसार 5 रुपये देने का तबियत नही रहता है, फिर वह जगह-जगह माथा-फोड़ी करते हैं। नेता न तो कद से बौनें होते हैं, न कांने होते हैं, न लूले होते हैं, न लंगड़े होते हैं, नेता तो दीदा दिलेरी होते हैं? अनिवार्य कुचम्भल बाना-धार वे अपने भिखारी होने की सूचना मतदाताओं के द्वार में देते हैं, और यही प्रजातंत्र की असल ताकत है कि ऊंट को भी पहाड़ के नीचे लाकर उसकी हैसियत दिखाता है। 
आज पाईजी! सुबह से ही मेरे द्वार में अजगर की भांति पसरे हुए थे, और गले मे चुनावी रुझानों का एक तख्ती भी टांग रखा था। पाईजी! का आहट मिला तो मैंने द्वार खोला तो पाईजी! बुलन्द अल्फाज़ो के साथ नमस्कार कविवर! करते हुए मेरे कमरे की ओर वगैर लगाम के घोड़े की तरह दनदनाते हुए प्रवेश किया। और आते ही कहा कविवर! काफी दिन बीत गए आप से मुलाकात नही हुआ था, तो सोचा आपसे मुलाकात भी हो जाएगा और आपके घर मे टीवी के माध्यम से पार्टी एंकर व पार्टी प्रवक्ताओं के खीझ भी देख-सुन लेंगे?
पाईजी! सोफे में जा टिके और मन भर सांस लेते हुए बोले कविवर! आप समस्त कवियों की मुख में क्या साक्षात सरस्वती विराजमान होती है, जो-जो आपने कहा था सत्य हुआ?
मैंने कहा पाईजी! हम कवियों के कथन सत्य हो न हो अपितु जिस अंहकार रूपी भोजन को खाने हेतु सत्ताधीश तत्पर थे, उस भोजन को तीन राज्यों की जनता ने मन भर तो खिला ही दिया है व साथ ही बतलाया भी की प्रजातंत्र में राजनीति किसी भी अहंकारी नेता के लिए पूर्ण काल-कालिक नही है-आज है कल नही होगा?
कविवर! आप ये बताइये कागजो में विकास के नाम पर फैले इस विहड़ जंगल में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में खूब विकास किया था फिर क्यों हार गए?
पाईजी! अब तुम ग़ालिब की टांग तोड़ कर कहोगें कि आसमाँ जो टपका वह पानी था या ओष। म.प्र. व छ.ग. के राज्य में भाजपा पीछले 15 वर्षों से सत्ता में काबिज रहा और धीरे-धीरे उनके मस्तिष्क में अंहकार का भयावह बोझ लद चुका था, पतन सुनिश्चित था? दूसरी वजह केन्द्र से भी बुलन्द अल्फाज़ो से अंहकारी बयान बाजी की सिलसिला निरन्तर जारी रहा है। अब तुमनें अमित भाई के बयानों को नही सुना क्या जिसमे उनका सबसे चर्चित बयान सवर्णों के वोट हमें नही चाहिए? तो उन्होंने शायद नही भी दिया सर्वणों ने तो अपनी कार्यवाही पूर्ण की। बस भाजपा को सवर्णों का पलटवार नही हज़म हुआ। म.प्र. में भाजपा की सीट सिकुड़ने की एक वजह जगत मामा भी हैं, जिन्होंने अपने पेट की समस्त गन्दगी मंच-दर-मंच में ऊँगली डाल-डालकर उगला है। तो दूसरी वजह किसानों की कर्जमाफी का है, जो इन्होंने परिहास का हिस्सा मात्र समझ बैठा किसानों ने भी हांथ मसल कर पुनः पुरातन वंशवादी पार्टी में दनादन बटन दबाया। छत्तीसगढ़ राज्य से भाजपा के हार की एक वजह केन्द्र में बैठे सत्ता के मठाधीश भी हैं, जिन्होंने कांग्रेस को आड़े हांथो लिया जिसको कैलाश विजयवर्गीय ने भी स्वीकारा की हमनें कांग्रेस को हल्के में लिया? यह तो केन्द्र का ग़ैरदाजाना रवैये का परिणाम है कि जिन्होंने कांग्रेस के भल्लावियों को विधानसभा के चुनाव में चारों खाने चित्त कर देने के सपनें सँजोकर रखे थे। कहीं-न कहीं यह कांग्रेस के जीत के साथ ही 2019 के चुनाव में जीत के सपनों का पतन है।
कविवर! फिर आपको ये नही लगता है कि एक्ट्रोसिटी एक्ट में जो प्रधान जी! ने कोर्ट के फैसले पर अध्यादेश लाया वह भी हार की एक वजह है?
पाईजी! अगर ऐसा होता तो उसका नुकसान कांग्रेस को भी होना चाहिए था, क्योंकि विपक्ष में बैठकर विरोध भी तो नही किया। पहली बात तो ये की जिस टांग अड़ाने की रूढवादी प्रथा से संसद चलता है, वह भी तो नही किया। दूसरी बात जिस एक्ट्रोसिटी एक्ट के विरोध में सपाक्स पार्टी बनी उसी ने तो खुला एलान कर दिया था कि हमारी सीट कांग्रेस के समर्थन में जायेगा? फिर सवाल ही नही उठता की एक्ट्रोसिटी एक्ट भाजपा के पतन का कारण है। सुनो पाईजी! भाजपा के धुँधले आईने में अब विकास नही दिख रहा था, रडारों में दरार पड़ गया था। बस जनता ने उस धुँधले से विकास के आईने को हाथ से छोड़कर चकनाचूर कर दिया, और 2019 लोकसभा चुनाव के पूर्व तीन राज्यों के विकास का जो आईना टूटा उसकी खनक ऐसी थी के प्रधान के चेहरे में सिकन आना लाज़मी था। और रही बात राजस्थान में कांग्रेस के जीत का तो ये कांग्रेस की जीत नही है बल्कि सचिन पायलट के युवा नेतृत्व व आकर्षक व्यक्तित्व की जीत है। और जो कांग्रेस को एक योग्य नेता की तलाश रहा।सचिन पायलट के रूप में मिल गए हैं, सहज व भाषाबोध के धनी है। 
कविवर! आप कहते हो तो मान लेता हूँ, बशर्ते एक बडी चिन्ताजनक बात है कि आम आदमी पार्टी अपनी इज्जत भी न बचा सकी पर वहीं कांग्रेस की जीत में खुश भी है?
पाईजी! आम आदमी पार्टी अब ‘आम’ नही रहा ज्यादा गदरा जाने की वजह से उसमें कीड़े लग गए हैं, जिस कीड़े को गिनवाने के लिए वह कांग्रेस के दरबार में छुका हुआ है। एक कुशल कवि डॉ. कुमार विश्वास ने इन्हें सही दिशा प्रदान करना चाहे मगर इनके कदम कुमार के विरुद्ध ही उठ गए और उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कुमार विश्वास ने भरपूर प्रयास किया कि आप पार्टी सही दिशा में काम करे जिसके लिए उन्होंने सरकार बनाया था, अपितु अफ़सोस कुमार का मन आहत करके उन्हें बाहर कर दिया। और सेठों को उनकी जगह दे दिया। अब तो जल्द ही आप पार्टी भारत के दिल-दिल्ली से भी साफ हो जायेगा। और अन्ततः कांग्रेस का दरबार मे घुटने टेग देंगे।
पाईजी! ये तो सब सियासत है, चलता रहता है लेकिन जिन विधायकों ने जीत की खुशी का जश्न मनाने के लिए नया कुर्ता-पजामा सिलाया था, वह तो अगले पंचवर्षीय तक अलमारियों में रखे-रखे मैले हो जायेंगे। एक और मजेदार बात है कि प्रधान जी! का एक और राग स्थापित हो गया है-‘‘कांग्रेस मुक्त भारत का?’’
पाईजी! मेरा एक शेर है जाते-जाते सुनते जाओ कि-
‘‘जनता के दर्द-दिलों का भी
कुछ पैगाम लेना
आखरी वक्त में भी
अन्दाज-ग़र सलाम लेना
जब कभी याद आये उस कुर्सी की
अंहकार को मार कर
एक बार आईना जरूर देख लेना?’’

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