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‘‘वगैर चुनाव के मिस्टर लल्लूराम अध्यक्ष घोषित?’’

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(राजकमल पांडे ‘आजाद’)
जब अखबार व चैनलों ने शोर मचाया तो नेताओं ने भी भाषण देना प्रारंभ किया, देखो नगर पालिका चुनाव आ गया। और हो सकता है, पहले नेताओं ने भाषण दिया तब पता चला या फिर अखबार चैनलों ने शोर मचाया तब पता चला, पता नहीं पहले क्या हुआ खैर नव्यनिर्मित सरकार जागी मंत्री, हड़बड़ाए अफसरों द्वारा दिए जाने वाले चुनावी चंदाओं की होड़ लगी नेताओं की बैठक चहचाहे कुछ पार्टी के निष्ठुर कार्यकर्ता चाय लेने होटलों की ओर दौड़े वक्तव्यों की झाडुएं शहर में चलने लगी पूर्व अध्यक्ष लाल और लल्लूओं ने अपने पंख फड़फड़ाए व एक लम्बी जमुहाई के साथ कांन से रुई निकाला कुछ इस तरह जैसे कुम्भकर्ण बरसो बाद जागा हो। और पार्टी मीटिंग में जा पहुंचे पार्टी ऑफिस पहुंचते।

लल्लूराम ने अपने विचार रखते हुए कहा मित्रों नगरपालिका चुनाव के लिए हमने जो षड्यंत्रों के धागे बुने हैं, उन्हें यथास्थित रखा जाए और झूठ फरेब का प्रचार निरन्तर होता रहे। इस बार हर हाल में हमें अपने प्रत्याशी को चुनाव जिताना है, हमारे पास ज्यादा समय नहीं बचा है, और मेरी उम्र तो देख ही रहे हो घर में आराम फरमाने का है। अपितु मुझे कुर्सी की लालायिता ने इस पार्टी ऑफिस तक खींच लाया क्यूँकि मैंने जो पूर्व में कुर्सी पर बैठकर लझेदार मिठाई खाया है, इस बार चाहता हूं की मेरे द्वारा चुने जाने वाला प्रत्याशी भी उसको को चखे व इस कस्बा नुमा शहर को और गर्द में डाला जाए। सत्ता रूढ़दल के कर्णधारों ने बैठक ली यह बात शहर में आग की तरह फैल गया। उधर सत्ता पक्ष के लालों ने भी एक बैठक ली वक्तव्यों से नव्यनिर्मित विधायक का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
मेरे प्रिय भाइयों और बहनों व सभी गणमान्य नागरिकों को मेरा नमस्कार! जैसा कि अभी-अभी हमनें अपनी सरकार बनाई है, और इस प्रयास में हैं कि अध्यक्ष भी उसी मुताबिक के बनें। अब तो ईव्हीएम मशीन का रोना विपक्ष रोएगी हमनें भी मित्रों 15 साल तक रोया है, रोया क्या बूंद-बूंद खून के आँसू गिरे हैं। सभी झण्डे व डण्डे गन्धो में रख लें क्यूँकि चुनाव सम्पन्नता के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है, झण्डा इस बार भी हमें नगरपालिका में अध्यक्ष अपना चाहिए। अन्यथा 5 वर्ष नगरपालिका का वनवास झेलना होगा। विकास हमारे बस की बात भले न हो बशर्ते अध्यक्ष अपने मुताबिक का होना चाहिए।
आज पाईजी! चौराहे में मेरी कविता के पोस्टर चस्पाँ कर रहे थे। और मैं दूर खड़े गुमटी से पाईजी! की इस हरकत को देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। पाईजी! आते-जाते सभी राहगीरों को पोस्टर की ओर देखने के लिए इशारा कर रहे थे व साथ ही उस कविता को गुनगुना रहे थे-
कुछ मीठे-मीठे गीत गुनगुनाइए,
नगरपालिका चुनाव आ गया!
आस-पड़ोस जनों से घुलमिल जाइये
नगरपालिका चुनाव आ गया!
मैं उस चौराहे से पाईजी! के नजरों से बच निकलने की कोशिश पर था। अपितु पाईजी! की नजरों से तो रामू और श्यामू भी नही बचें फिर मैं कौन होता हूँ। बच निकलने की कोशिश में पाईजी! के निगाहों में कैच हो गया। पाईजी! ने एक लम्बे स्वर में आवाज दिया। नमस्कार कविवर! मैं पहले खीझा फिर पलट कर प्रतिउत्तर दिया। नमस्कार! नमस्कार!! पाईजी! कैसे ये तुम क्या कर रहे हो मेरी कविताओं को चौराहे में क्यूँ चस्पाँ कर रहे हो।
कविवर! आपकी कविताओं को मैं चौराहे में इसलिए चस्पाँ कर रहा हूँ ताकि यहाँ की आवाम सतर्कता पूर्वक मतदान करे। व साथ ही यह भी सन्देश दे रहा हूँ कि अगर कोई नेता तुमसे 5 साल बाद बात कर रहा है, तो ये समझ जाना चुनाव नजदीक ही है। चुनावी साइरन के लिए कोई भी प्रशासनिक पत्र जारी करने की जरूरत नही है, इतना सूचना पर्याप्त है कि जब नेता आपके द्वार में अपना लार टपकाना प्रारंभ कर दें तो समझ जाना चुनाव आ गया है।
अच्छा कविवर! आप से एक सवाल है कि क्या लल्लूराम मानसिक तनाव से ग्रसित हैं, जो उन्हों अपने आपको अध्यक्ष भी घोषित कर दिया है। कलुआ और मुनुआ तो मुँह ही ताकते रह गए! और इधर गजुआ टिकट की दौड़ से बाहर होते दिख रहे हैं, ये हो क्या रहा है?
पाईजी! जब लल्लूराम के मनसूबे फ़ौलादी हैं, अध्यक्षी सीट पाने के लिए पूरी जद्दोजहद है, तो सीना ठोंककर अपने आपको अध्यक्ष कैसे घोषित न कर लें। हाँ पर एक बात है, लगता मिस्टर लल्लूराम 1985 के राजनीति से बाहर नही आ पाएं हैं, उन्हें यह नगरपालिका चुनाव कम ग्राम पंचायत का चुनाव ज्यादा मालूम पड़ता है, उन्हें इस बात का तासीर होना चाहिए की अनूपपुर नगरपालिका में अध्यक्षी सीट के विधाता लगभग 22 हजार मतदाता हैं, लल्लूराम के इस अल्फाज़ से मालूम पड़ता है कि अध्यक्ष बनने का कोई सपना रात में देखा था, और सुबह-सुबह बॉसी मुँह लल्लूराम ने एलान कर दिया कि हमनें चुन लिया है, अध्यक्ष कौन कलुआ, कौन मुनुआ और कौन गजुआ?
पाईजी! खिलखिलाते हुए बोले आप भी कमाल करते हो कविवर! अच्छा आप ये बताइये अनूपपुर की आवाम ने जिस लल्लूराम खून चूसने वाले खटमल को पदच्युत कर दिया था, वह फिर क्यूँ उस सियासत की बिस्तर में चढ़ने को उत्सुक हैं।
तुम भी पाईजी! निहायती बुड़बक हो लल्लूराम उर्फ बेताल ने अपने राजा विक्रमादित्य के कन्धो पर खड़ाहुँ तो रखवा ही दिया। अब खुद रखने के लिए प्रयासरत हैं। मिस्टर लल्लूराम नगरपालिका अध्यक्षी चुनाव लड़कर बचा हुआ इज्जत तार-तार करवाने में लगे हैं। और जब तक मिस्टर लल्लूराम को अनूपपुर की मतदाता धक्केमार कर अपने द्वार से नही भगा देते तब तक वह चुनाव लड़ते रहेंगे।
पाईजी! पुनः जोर से एक ठहाका लगाया व बोले कविवर! आज का खाना शायद ठीक ढंक का पच सकेगा आप जो मिल गए हो। एक बात और है, कविवर! ये मिस्टर लल्लूराम किस घाट का पानी पी-पी कर बड़े हुए हैं, इनको अपना इज्जत उरवाने में ज़रा सा भी आंख में पानी नही है।
अरे पाईजी! हमारे शहर में एक दुल्हा नामक तालाब है, मिस्टर लल्लूराम वहाँ का पानी पीते हैं, पर ऐसा नही वहाँ का पानी सभी पीते है। अपितु इनके बेशर्मीयत का पैमाना इसलिए नही छलकता है कि क्यूँकि ये अपनी इज्जत उतरवाने में माहिर हैं। इनको कुछ दिनों बाद भारत सरकार सबसे ज्यादा बेशर्मीयत में मशगूल नेता होने का प्रशस्ति-पत्र देने वाली है, शायद इसी 26 जनवरी में ही दे दे।
अब पाईजी! मुझसे बच निकलने के प्रयास से नमस्कार करने लगे। मैंने कहा बैठो पाईजी! और सुनो इस बार पार्षदी चुनाव में नए-नए भावी चेहरे मिस्टर लल्लूराम उतारने वाले हैं, और शायद अपने ही जैसे विधा में अनुकूल नेताओं को चुनावी रण में धकेल देंगे। मिस्टर लल्लूराम पूरी कोशिश में है कि इस बार शासकीय राजकोष खाली करके ही दम लेंगे। बस एक बार अध्यक्षी सीट मिल जाये। इसलिए अपने आत्म संतुष्टि के लिए मिस्टर लल्लूराम ने बॉसी मुँह एलान किया था, हम इस शहर के वगैर चुनाव लड़े अध्यक्ष हुए अब तुम मान लो।
पाईजी! अगर तुम जा ही रहे हो तो जाते-जाते मेरा एक शेर सुनते जाओ कि
‘‘फसलें बाहर आयी, चमन जल गया तेरा
गुजरे लम्हें कहाँ से लाओगे, अमन जल गया तेरा
खूब ढूंढ़ा बहुत तलास किया, शामों शहर में
सुर्खियां तन को उड़ गयी, वाकिया हिल गया तेरा?’’
राजकमल पांडे ‘आजाद’

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