# भारत में रिकार्ड ; एक ही दिन में मिले 26000 हजार से ज्यादा मामले ## भारत में कोरोना का कुल आकड़ा 822,603 # वहीँ 516,206 मरीज ठीक हुए,तो वहीँ 22,144 लोगों की हुई मौत # # भारत विश्व में कोरोना के चपेट में पंहुचा तीसरे नंबर पर ये बढ़ता आकड़ा, डराने वाला है # वही रिकवर मरीजों की संख्या भारत में बेहतर ##

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‘‘…हे विकास पुरूष अब जाग जाओ?’’ -०राजकमल पांडे ‘आजाद’

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मैं जब पैदा हुआ उसके नौ घण्टे बाद रावण दहन हुआ। ऐसा नही है कि पहले नही होते थे, अपितु मैं जब इस सुन्दर से भारत में आँख खोला सोच-समझ शून्य थे, पर जब वह उम्र के बढ़ाओ में गया। तो देखा एक मंच में कई रावण बैठे थे। उनकी विषैली मुस्कान रावण के किरदार को फीका कर रहा था। एक चटियल मैदान के कोने में एक अंहकार रूपी विशाल पुतले को देखा। दुबक जाना लाज़मी था, मेरे बाल अवस्था के सपनों से भी भयावह राक्षस था। एक ऐसे पुतले को जलाते थे जिसमें कोई जान ही नही निर्जीव को? अपितु हमारे हिन्दू ग्रंथ के मुताबिक यह कहता है कि अंहकार को मारो और रावण का जब पुतला तैयार किया जाता है, तो वह विशाल चट्टान के भांति एक अंहकार रूपी स्वरूप तैयार हो जाता है। बशर्ते एक दिक्कत यहां आन खड़ी होती है कि तीर-कमान उनके हाथ में होते है, जिनके आँख में पानी नही वह पानी जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम में थे।
आज पाईजी! से कलेक्ट्रेट सभागार में ही मुलाकात हो गया। मुझे देखते ही पाईजी! ने एक जोरदार तंज कसा बोले आई मेरे भारत के नागरिकता से बाहर फेंके गए कविवर! मैंने कहा पाईजी! तुम तो मत बोलो यार सारा शहर यही कहता है। पाईजी! बोले कविवर आप इस संभागीय क्षेत्र के इकलौते अदने से व्यंग्यकारक व कवि हैं, और आज स्वयं एक व्यंग्य बन कर रह गए हैं। फिर पाईजी! एक मधुर मुस्कान के साथ कहा ये बात छोड़िए कविवर! आपको भारत की नागरिकता की क्या जरूरत है, आप तो लोगो के ह्रदय में गूढ़ी मारे बैठे हो वहां से आपको कोई रद्द नही कर सकता।
पाईजी! कुछ मुद्दे छेड़ने के फ़िराक में थे, और मैं उनके सवालों के अम्बार से बच निकलने के प्रयास में था। अपितु पाईजी! के सवालों से बच निकलना आसान कहाँ। पाईजी! बोले
कविवर! आप ये बताइये इस अनूपपुर विधानसभा सीट में जो-जो विधायक जनताओं के द्वारा चुने गए, वह विधायक इस शहर के लिए कितना कारगर सिद्ध हुए। आज तक अनूपपुर विकास की पटरी में क्यों नही आ पाया। जिनके अगुवाई में कस्बानुमां क्षेत्र जिला बना उन्होंने तो केवल अपने मुस्कान से ही सितम ढाया है।
पाईजी! तुम भी कहां बेकार की बातों में पड़ जाते हो। सुनो नेता चाहे किसी क्षेत्र के होने अगर किसी ग़फ़लत बस विधायक चुन दिये गए हैं, तो उनकी पहली इच्छा ये है कि राजधानी में एक बंगला हो, व जीत का सेहरा बांध के जब आएं तो स्वागत कक्ष में खड़ी एक नवागत भौजी हो जो माथे के टपकते पसीने को अपने पल्लुओ से पोछे। और यही उस क्षेत्र का सम्पूर्ण विकास है, और जनता ऐसे रूप में ही विकास खोज ले। और रही बात इस कस्बानुमा क्षेत्र के विकास की तो वह विकास सम्भव नही है, क्यूँकि जनता ने जिन्हें विधायक चुना है, वह मंत्री पद न पाने से राजधानी में ही जड़ फोड़ दिए हैं। इधर दिग्गिराजा भले पद में न बैठे हो अपितु सरकार की कंमुर्री वही लगा रहे हैं कि ‘‘हे..हाथ इन्हें मंत्री बना दो हे…नाथ उन्हें संत्री बना दो’’ हमारे विकास पुरुष को मंत्री पद नही मिला तो उन्होंने कहना है कि आप हमें ऊर्जा से लेकर स्त्रोत तक जो भी विभाग सौंपना हो सौंप दीजिये। वरना मैं अपने क्षेत्र में जाकर क्या मुँह दिखाऊंगा की भाई और भतीजावाद की बलि चढ़ गया।
पाईजी! खिलखिलाते हुए बोले आप भी कविवर! कमाल करते हो। अच्छा आप ये बताइये शहर का विकास होगा की नही।
पाईजी! शहर का विकास उन लाखों मतदाताओं का अधिकार है, जो उन्हें मिलना चाहिए। पाईजी! आज एक अजीब घटना मेरे घटित हुआ। सुनो आज पूरे शहर का विचरण करने के बाद मैं रेलवे फाटक पार करके आ रहा था, तो मुझे फ्लाई ओव्हर ब्रिज से लेकर वो सभी मुद्दे आन्दोलित महसूस हो रहे थे, और जैसे वह किसी की राह ताक रहे हों कुछ इस स्वर में कि-“हे विकास पुरूष, हे संभागीय क्षेत्र के जेष्ठ नेता मेरा निर्माण करो, मुझे विकसित करो, मुझसे यह देखा नही जाता कि सड़क में आती-जाती हेमामालिनी की गालों में पॉन्ड्स पाउडर की जगह सड़को में उड़ रहे सियासत के धूल चटक रहा है। युवाओं के लहराते केश, खिजाब लगाने की नौबत ला रहा है, हे विकास पुरुष सब्जी मंडी विकसित होने के लिए आपकी राह ताक रहा है, हे विकास पुरुष शहर के सीने में अतिक्रमण बढ़ रहा है, हे विकास पुरुष बस स्टैंड में दो बसों के रुक जाने से समूचा आवागमन रद्द है; वह रद्द आवागमन आपको पुकार रहा है; हे विकास पुरुष लौट आओ, हे विकास पुरुष जिला चिकित्सालय 200 बिस्तर में तब्दील होने के लिए व्याकुल है, हे विकास पुरुष तुलसी कॉलेज पी.जी. कॉलेज में रूपांतरित होने के लिए उत्सुक है, हे विकास पुरूष खेल मैदान का निर्माण अधूरा है, हे विकास पुरूष शहर के गढ्ढे में उचकते पहिये पुकार रहे हैं, हे विकास पुरुष लौट आओ, हे विकास पुरुष आप ही इस संभागीय क्षेत्र के विकास पुरोधा हो।
पाईजी! के एक इंच के मुँह से बक्र नही फूट रहा था। कुछ क्षणों बाद पाईजी! ने इतना जोर का हँसी फोड़े की कलेक्ट्रेट सभागार के दरवाजे और खिड़कियां हिलने लगी। फिर एक सवाल कर बैठे बोले।
कविवर! आप ये बताइये क्या नवनिर्मित सरकार जो छिंदवाड़ा मॉडल का राग अलाप रहे हैं, तो क्या वह अपने विधायक की अगुवाई में अनूपपुर मॉडल बना पाएंगे।
पाईजी! तुमको ऐसा लगता है कि हो पायेगा। जब हमारे लोकप्रिय प्रधान जी! बनारस को क्यूटो नही बना पाए तो ये नवनिर्मित सरकार छिंदवाड़ा मॉडल के स्वरूप में अनूपपुर मॉडल कैसे बना पायेगी। अपितु हो भी सकता है क्यूँकि अनूपपुर जिले से तीन सीट प्राप्त हुआ तभी सरकार बनाना सम्भव हो सका है। अनूपपुर तो अब महानगर बनाना चाहिए।
कविवर! आप ये बताइये जब योगी इलाहाबाद को प्रयागराज बना सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है।
पाईजी! फिर तो अनूपपुर का नाम अहंकारपुर होना चाहिए जिस क्षेत्र की जड़े अपने मूल पर हों उसके स्वाभावगत ही नाम होना चाहिए क्यूँकि यहाँ अंहकारी नेताओं की जमात बहुत लम्बी है। जैसे प्रयागराज अपने मूल पर आया।
तो हे कविवर! मुझे इजाजत दें ताकि मैं अब घर की तरफ कूच कर सकूँ।
ठीक है पाईजी! जाइये पर जाते-जाते एक सलाह लेते जाओ की ”द एक्सीडेंटल प्राइम मनिस्टर” मूवी देखने जरूर जाओगे। और दुष्यंत कुमार जी की चन्द पंक्तियां अर्ज करना चाहता हूं कि-
‘‘पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं’’

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