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‘‘दर्द क्यूँ छुपाते हो बयां क्यूँ नही कर देते?’’ @राजकमल पांडेय आजाद

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जब मेरे शहर में एक तरह की खामोशी छा जाता है, रात काटने को दौड़ता है कुत्तों का खांओ-खांओ, सोने नही देता। तब उस सन्नाटे को अपनी कलम में समेट कर लिखता हूँ।
आज सुबह-सुबह शहर के अखबारों की हेडलाइन पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ! इसलिए कि इस शहर की अवाम अकेले नही सो रही है, कुछ सजग प्रहरियों को भी सोते रहने की आदत है? कुमदिनी के नए-नए पतवारों की चिंता ये है कि राज्य सरकार ने जो पोषण आहार वितरण करवाया था, उसे सियारों ने कैसे अकेले खा लिया। महिला बाल विकास नें कितने अमरूद स्वयं खाये कितना हमें खिलाएंगे! उनकी ये चिंता है। कॉन्फ्रेंस में कौन सी कुर्सी में कौन बैठेगा इसके लिए कॉन्फ्रेंस रूम में प्रवेश के पूर्व 40 वर्ष के पत्रकारिता जगत में योगदान वाले वरिष्ठ पत्रकार ने नाक सिकोड़ लिए। साधुवाद का किसी ने तमगा नही दिया, तो उन्होंने नगरपालिका के कूड़ेदान का बोर्ड ही टँगा लिया। वैसे पत्रकार बनने की पहली प्राथमिकता ये है कि आप मुद्दे-रहित बनिये जनमानस के बोझ उठाने की कोशिश की तो अपने अधिकारों से वंचित कर दिए जाओगे। और साथ ही राज्य-केंद्र व प्रशासनिक लाभकारी टॉनिक नही मिलेगा? इस शहर के अखबारों की हेडलाइन ये है कि विकास पुरुष विधायकी सीट जीतने के बाद कौन सी करवट सोते हैं-चित या पट, रामू-श्यामू पराजय के बाद कौन सी दिशा में लघुशंका करते हैं-उत्तर या दक्षिण? मिस्टर लल्लूराम बालों में कौन से कम्पनी का तेल लगाते है, जो जवानी बीत जाने के बाद भी सुनहरे हैं? मिस्टर लल्लूराम के लिए कौन सी राइसमील से चावल आता है, जो चाल में इतना लचीलापन है। वामपंथी विचारकों के आज हलक से पानी उतर रहा है कि नही। अर्धनारीश्वर ने आज कितना किलोमीटर चले, वजन कम हुआ के नही- आज के यह अखबारों की हेडलाइन हुई?
पाईजी! आज शाम को 10%-10% का राग अलापते हुए अपने सीने में बार-बार हांथ मार रहे थे, और नाक में एक अंकूठा चढ़ाकर विपक्षी दलों को चिढ़ा रहे थे! देखा 56 का सीना या भुजाओं का भी बल देखना है। मैं पाईजी! का ये तमाशा नगरपालिका के लाइब्रेरी वाले जर्जर भवन में खड़े-खड़े सब देखा रहा था। मेरे आवाज लगाने के पहले पाईजी! ने मुझे देख लिया। ‘‘देखते ही बोले नमस्कार कविवर! अरे उतरिये उस भवन से कविवर! अगर किसी ने तेज से ख़ास दिया तो जीवन का रिजर्वेशन क्लियर हो जाएगा।’’ मैं हंसते हुए धीरे-धीरे सीढ़ी से नीचे आया। और बोला क्या बात है-पाईजी! ये 10%-10% का राग क्यूँ अलाप रहे हो!
कविवर! आपको नही पता अब हम भी 10% विकलांग हो गए हैं। 56 इंच का सीना 62 इंच हो गया है।
पाईजी! तुम बहुत बुड़बक हो तुमको यह पता होना चाहिए कि सवर्ण को जो आरक्षण 10% दिया गया है, यह सिकुड़ते हुए लोकतंत्र की पहली कड़ी है। खैर छोड़ो इन बातों को ये सियासत है सब चलता रहता है। ‘तुम बताओ क्या हाल है, तुम्हारा।’
कविवर! मेरा हाल तो इस शहर से भी बदतर है, इस शहर में कुछ भावी-समाज सुधारक स्वयं को प्रबुद्धि का प्रशस्तिपत्र देकर अब यह सोच में है कि की सम्मान किस साइज का होना चाहिए। और किसे मिलना चाहिए किसे नही वही सब तय कर लेते हैं। कविवर! मुझसे बहुत लोगों ने कहा कि आपके कविवर! कहाँ है तो मैने भी कह दिया अपने अधिकारों के लिए स्वयं लड़िये सबका टेंडर अकेले मेरे कविवर! ने भरा है क्या?
पाईजी! ऐसा मत बोला करो लोगो का मन आहत होता है। तुम नववर्ष में जिन्हें सॉल और श्रीफल से सम्मानित किया गया है। उनकी बात कर रहे हो क्या-‘‘तो सुनो ये सम्मान समारोह नही था, बल्कि सियासत के प्रति कर्तव्य निष्ठा में तेजी के लिए सम्मान दिया गया था। वैसे खबरे भी उसी लिहाज़ से लिखना चाहिए था कि कुछ कांग्रेसी एजेन्ट को सॉल और श्रीफल से नवाजा, कुछ भाजपाई एजेन्ट को भी बचा हुआ सॉल-श्रीफल दिया गया।’’ पाईजी! खिलखिलाते हुए बोले-
कविवर! आप भी कमाल करते हो। वैसे कभी आप भी तो इसी झण्डे के नीचे अपना आशियाना बनाया हुआ था, बड़ा जल्दी भूल जाते हो।
अरे पाईजी! वह आशियाना इन कलम धुरंधरों की आंधी को न झेल पाया। वह आशियाना कोई आकार ले पाता तब तक मेरा वध हो चुका था। ‘‘फिर पाईजी! ने सवालों को बदला और कहा’’
कविवर! आप ये बताइये इस कस्बानुमा-शहर कब विकास की परिभाषा में ढाला जाएगा।
अरे पाईजी! ये शहर विकास की परिभाषा में तब ढलेगा जब यहां की स्वतंत्र चेतना होगी। तुमने राजस्व विभाग की स्थिति देखी है ‘‘राजस्व विभाग में तो निठल्ले-पन की बेशर्मी चढ़ी है! गरीबो के चप्पलों के शोल जमीन को छू गए! अपितु गरीबों के कपकपाते हुए बदन में न्याय की परत न चढ़ सकी! कोई रो-रो कर दर्द बताया, किसी ने मुस्कुरा कर दर्द छुपाया? यद्यपि जितना भी मुखरित हुआ, सब मे थोड़ा-थोड़ा दर्द पाया? उधर नवागत ‘‘बहादुर शा’’ ने गाना गाया, तो समूचा कलम-कुनबा उस थिरकन में नजर आया? कार्यक्षमता से ऊपर उठकर ‘‘हुकूमत’’ ने जिम्मेदारी सौंपी तो राजस्व विभाग में बैठे कारिंदे आसमान में आहें भरते नजर आया? जिला चिकित्सालय में अगर कोई पेट दर्द का मरीज पहुँच गया, तो वह मरीज कब सिर के दर्द से तड़पने लगे पता ही नही चलेगा। इस शहर की समस्या ये नही है कि सड़क, पानी, ब्रिज नहीं। यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है यहाँ नेता नही, शहर में दो-चार पत्रकार हैं जिन्होंने पूरा बोझ उठा रखा है बांकि बचे लोगो ने कसम खाई है सियासत का चरण नही छोड़ेंगे। जब ऐसा दोनों कुनबा निजी बढ़ावे में व्यस्त हो तो क्या कीजियेगा। चलिये ऐसे थिल्लीड शासनिक व प्रशासनिक व्यवस्था में एक जोर-दार तालियां हो जाएं पाईजी? ‘‘पाईजी! ने जांघो में थाप मारते हुए बोले वाह! कविवर! वाह!! सच मे आप कमाल हो?’’
अच्छा कविवर! अब ये बताइये आपने साहित्यकार का चोला ओढ़कर पत्रकार को गलत कह रहे हैं। थोड़ा सम्भल कर, क्या आपके कलम में दाग नही है?
पाईजी! मेरे दामन में दाग हो न हो अपितु मैंने कभी कलम को दागदार नही किया हां जिन्हें लगता हो, वह उस दाग की परिभाषा भी बतलाएं! सही होने पर मैं उन पत्रकार को सबसे पहले समर्थन देता हूँ, गलत होने पर सबसे पहले मैं ही बोलता हूँ। इसमे मैं कैसे गलत हुआ? पाईजी! मेरा एक शेर है, सुनते जाओ कि-
थपथपाना था जिन कन्धो को, उनसे किनारा कस लिया
समय की मार में एक, और इज़ाफ़ा कर लिया
इन पांव अभागों की मंजिल, तो नही मालूम-पर
जहाँ ठहर जाएंगे, मान लेंगे यही नियति ने तय किया था?
यह शेर सुनते ही पाईजी! का खिलखिलाता हुआ चेहरा लटक गया। बोले-
कविवर! दूसरों के प्रति आपकी यह चिन्ता न कभी-कभी मुझे चिन्ता में घेर देता है। सुबह-शाम उठते बैठते यही सोचता हूँ कि इस मुद्दे पर मेरे कविवर! क्या सोचते होंगे। और मैं कन्धो पर सवालों का पुलिंदा टांगे चले आता हूँ। उत्तर मिल जाता है-और मैं चला जाता हूँ, हफ्ते-दो-हफ्ते के लिए। अच्छा कविवर चलता हूँ-इस ठंड भरी रात में आप भी घर जाइये, देर हो रहा है, नमस्कार! शुभरात्रि पाईजी!

राजकमल पांडे ‘आजाद’

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