# भारत में रिकार्ड ; एक ही दिन में मिले 26000 हजार से ज्यादा मामले ## भारत में कोरोना का कुल आकड़ा 822,603 # वहीँ 516,206 मरीज ठीक हुए,तो वहीँ 22,144 लोगों की हुई मौत # # भारत विश्व में कोरोना के चपेट में पंहुचा तीसरे नंबर पर ये बढ़ता आकड़ा, डराने वाला है # वही रिकवर मरीजों की संख्या भारत में बेहतर ##

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‘‘….ज़रा ठहरिये अभी राजनीति आ रही है?’’

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 -०राजकमल पांडे
जब मनुष्य को यह भ्रम हो जाये कि उसके द्वार किये जाने वाले समस्त कार्य एकदम ठीक-ठाक हैं, तो उस मनुष्य को तत्काल हिमालय की तरफ कूच करने लेना ताकि ऐसा देंह हिमालय में पिघल सके। जीवन को अनवरत बहने दो जैसे नदी अपने सम्पूर्ण आवेग में बहती है। बिना किसी रोक-टोक के जैसे सूर्य का स्वभाव है, तपन देना चन्द्रमा का स्वभाव शीतल है! ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी जो अपने स्वभाव में अपना जीवन जीना चाहता है। हां पर जो व्यक्ति अंहकार का नमक चख लेते हैं-उनकी जमात नेताओं में लम्बा पाया जाता है। दरअसल नेताओं को यह भ्रम हो जाता है कि जो हैं-हम-हैं, समूचा सृष्टि हमारे में आ के ठहरता है। जनता के हित में किये जाने वाले समस्त कार्य जब तक योजनाबद्ध तरीके से नही होंगे तो नेताओं का कार्यकाल गफ़लत में फंसेगा, और समाज व राष्ट्र भी गफ़लत में आ जायेगा।
आज पाईजी! सुबह-सुबह बड़ी तेजी के साथ कहीं चले जा रहे थे मालूम नही कहाँ जा रहे थे। अपितु इतने लम्बे-लम्बे पग ले रहे थे जैसे आज ही समूचे ब्रम्हांड का भ्रमण करके लौटेंगे। मैं बालकनी से पाईजी! को जाते देखा पाईजी! ने भी मुझे देखा पर आज नजरअंदाज किया और पाईजी! का नजरअंदाज मुझे सोचने पर विवश कर दिया। मैं बालकनी से सीढ़ियों के सहारे नीचे आया और पाईजी! के पीछे जाने लगा यह जानने के लिए की आखिर पाईजी! जा कहाँ रहे है। फिर देखा पाईजी! चलते-चलते कब्रस्तान की ओर मुड़ गए! मैं भी गया। पाईजी! कब्रस्तान की गेट के बाहर अपना चप्पल उतारा और दनदनाते हुए अंदर प्रवेश किया। मैं बड़ा चिंतित हुआ यह जान कर की ये पाईजी! यहां करने क्या आये है। फिर मैं झाड़ियों में छुपकर देखा की पाईजी! दोनों हाथ आसमान की ओर करके नीचे ले जाकर अंगूठे में छुआ रहे थे। मैं सोचा ये पाईजी! क्या कर रहे है, कुछ समझ नही आ रहा है। फिर थोड़ी देर बाद पाईजी! जो लगे चिल्लाने…कोई है…….सब ठीक-ठाक है…..किसी चीज की कमी तो नही है। तेज से पुनः खीझ कर चिल्लाया…..अरे ओ कोई है इस कब्रस्तान में? मैं दौड़ा पाईजी! की तरफ यह सोच कर की कहीं कोई अनर्थ न हो जाये! मैंने जाते ही पूंछा।
क्या बात है पाईजी! ये तुम क्या कर रहे हो? पाईजी! मेरी आवाज पाते ही शरीर मे एक कंपन हुआ पलट कर कहने लगें!
कविवर! आप और यहां आप मेरा पीछा कर रहे थे? वो तो मैं यूं ही योगासन आ कर रहा था। यह कहते हुए पाईजी! ने दांत निपोरा, पर मैं खीझा!
पाईजी! ये कौन सा योगासन है, जो सिर्फ कब्रस्तान में ही होता है। कोई है…….सब ठीक-ठाक है-ये कौन सा आसन था! बाबाराम देव ने कोई नया आसन लांच किया है, या फिर तुम भी उनका झंडू चवन्यप्राश खाने लगे हो। पाईजी! हंसते हुए बोले-
कविवर! मैं तो इस कब्रस्तान में देखने आया था कि जो ब्रांडिंग मुर्दे हैं, वो ठीक से सो रहे हैं या नही। उनको कोई दिक्कत तो नही है, अगर होगा तो नवागत सरकार से दरख्वास्त करेंगे कि कब्रस्तान के मुर्दो के लिए कोई योजना चलाई जाए जिसमे उन्हें कम्बल, तकिया, चादर और खाने के लिए ट्राई फूर्ड वगैरा समय-समय दिया जा सके।
पाईजी! अब तो मुझे शक नही यकीन है, तुम पागलपन की चरमसीमा पार कर चुके हो! तुमको मुर्दो से बात करने की जो लाइलाज बीमारी लगा है, न उसके लिए तुमको कहीं सरकार प्रशस्ति-पत्र न दे दे।
फिर पाईजी! ने एक दर्शन मोहनी मुस्कान दी और सवालों को काटे हुए कहने लगें।
अच्छा कविवर! आप ये बताइये ये जो 2019 में लोकसभा चुनाव के लिए सियासी अस्तबल से खच्चर छोड़े गये हैं, कहीं वो लम्बी रेस को घोड़े न बनके तो नही निकले। जब की ये तो मुरझाए हुए फूल है सुन्ध कैसे देंगे। इस पर आप क्या कहना चाहते हैं?
पाईजी! 2019 लोकसभा चुनाव के सम्पन्नता लिए ये जो असुर जागे है, और नए-नए लुभानें भाषण इजात कर रहे हैं। ये भाषण अब इतने नेताओं के जुबान से होकर गुजर आये हैं कि अब वो भाषण बूढ़े हो चले हैं। सियासी अस्तबल से जो खच्चर निकलेंगे उनके गले मे हाईकमान जनता को लुभानें के लिए जीएसटी, पेट्रोल-डीजल व खाद्य सामग्रियों में जबरदस्त गिरावट का तख़्ती लटका देंगे। और जनता इनकी संवेदनाओं में फिसल जाएगी। गलती जनमानस की नही वो तो इन सियासी असुरों के कार्यभार का बोझ जो मंहगाई के रूप में उठाते है, उससे कुछ राहत पाते है। इसलिए भी वो थोड़ा फिसल जाते हैं। और पाईजी! मुरझाया हुए गुलाब के फूल में सुन्ध लाने का काम चाणक्य के जमाने भी सम्भव नही हो सका चाणक्य की नीति भी मुरझाए हुए फूल में सुन्ध न ला सकी।-पाईजी! खिलखिलाते हुए बोले-
कविवर! आप ने सुना राहुल बाबा लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान में निकलने वाले हैं, अब कौन सी नई मुसीबत पार्टी के लिए खड़ी करेंगे।
अरे पाईजी! तुमको पता है, राहुल बाबा चलते फिरते एक मुसीबत है। प्रधानसेवक जी! अपने निजी जीवन से कम राहुल बाबा! के बयान से ज्यादा परेशान रहते हैं। आंख मारने में तो बाबा का कोई मुकाबला कर ही नही सकता। वैसे पाईजी! तुम देखना राहुल बाबा जहां-जहां जाएंगे जनता को आभार के रूप में एक-एक मशीन व दस-दस क्विंटल आलू वितरण करते जाएंगे। पाईजी! ठिठोली करते हुए बोले कविवर! आप है किस साइड-पाईजी मैं तो अपने ही साइड हूं-कविवर! ये कौन सा साइड होता है, अपने साइड? पाईजी! तुम नही समझोगे। पाईजी- सर में हाथ फेरते हुए बोले मुझे समझना भी नही है?
कविवर! राहुल बाबा ने जो ये प्रियंका गांधी के रूप में अपने जेब से हुकुम का एक्का निकाला है, यह तो सियासत की गलियारों में सन्नाटा बो दिया है।
पाईजी! ये जो राहुल बाबा ने दांव खेला है, यह विपक्षी दलों के लिए बहुत बड़ी मुसीबत है। प्रियंका गांधी के बढ़ते राजनीतिक कदम विपक्ष नही रो पायेगी क्यूंकि प्रियंका के रूप में पुनः इंद्रा की वापसी हुई है व प्रियंका का राजनीति में प्रवेश होने का मतलब साफ है कि देश मे बढ़ रहे जाति-धर्म व गाय-गोबर से ऊपर उठकर भी राजनीति किया जा सकता है। जहां अटल, राजीव, नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, इंद्रा जैसे प्रधानमंत्रियों के स्वर देश मे गूंजे हैं, और जनता इनमें अपना सुन्दर से भारत का स्वरूप देखता था। जो आज वही देश जाति और धर्म के बेशर्मी तुष्टीकरण में उलझ गया है। अब जनता भी अकुलाहट महसूस कर रही है। ये राजनीति के नए-नए पतवार प्रकृति के बनाये नियमों को व उनके रचनाओं को भगवा नही कर पा रहे हैं, नही तो वही भी आज भगवा होता।
कविवर! आप ये बताओ ये जो उद्योगपति व नेतागण बड़े-बड़े घोटाले करते हैं, ये कौन सी विधा के अंतर्गत आता है। कोयला से लेकर गायों का चारा-भूंसा तक नही छोड़ रहे हैं। बस गायों के गोबर बस बचें हैं।
पाईजी! तुम ये बताओ हम मनुष्यों की जरूरतें कब तक सीमित हैं, जब तक हम नेता नही बन जाते कुर्सी मिली शासकीय राजकोष खुला मिला भर लिए झोली में जितना मन हुआ। वैसे पाईजी! एक बात है, ये नेतागण न शायद शैतानों के उपासक होते है, सब नही वो नेता जो जनता के अधिकारों का गला घोंटते हैं। ऐसे नेता जन्म से आकर्षक व्यक्तित्व के होते हैं। इनका पेट हमारे व तुम्हारे जैसा ही होता है, बशर्ते ऐसे नेताओं का पेट पैसा खाता है; और हम अन्न खाते हैं। हम पानी पीते है, और वो गरीबों का खून पीते हैं। पाईजी! वैसे हम ऐसे घोटाले करने वाले नेताओं को आधुनिक युग का दानव भी कह दें तो कोई अतिसंयोक्ति पूर्ण बात नही होगा। आजादी के बाद भारतीय छोटा व मध्यमवर्गीय जन ही घोटालों से प्रभावित हुआ हैं। बड़े लोग जैसे उद्योगपतियों का कुछ हुआ नही हैं, वो तो केवल सत्ता का स्वाद लेते रहे हैं। अब देखना जल्द ही गोबर गणेश योजन चलने वाला है। जिसमे नेताओं के जनमानस के प्रति कार्यक्षमता शून्य होगा उस नेता को इस योजना से लाभान्वित कराया जाएगा। पाईजी! हसंते हुए बोले मतलब तब हद्द ही हो जायेगा।
अच्छा कविवर! जिन्हें भारत देश में सांस लेने व छोड़ने, मन मुताबिक रहने-घूमने और जब मन हो किसी को कुछ बोल देने की आजादी है। आज उन्हें देश असहिष्णु लग रहा है क्यूं?
पाईजी! इन सब चीजों में जीएसटी नही लगा है, जिस दिन लग जायेगा यही सपना सुन्दर से भारत सहिष्णु लगेगा। अब तो इस युगों के दानव तीन युगों के पश्चाताप करें। जो तीन युगों का बकाया है। पाईजी! दुष्यंत कुमार जी ने क्या खूब लिखा के कि-
तुम्हारे आभार की लिपि में प्रकाशित
हर डगर के प्रश्न हैं मेरे लिए पठनीय
कौन-सा पथ कठिन है…?
मुझको बताओ
मैं चलूँगा।‘‘….ज़रा ठहरिये अभी राजनीति आ रही है?’’
-०राजकमल पांडे
जब मनुष्य को यह भ्रम हो जाये कि उसके द्वार किये जाने वाले समस्त कार्य एकदम ठीक-ठाक हैं, तो उस मनुष्य को तत्काल हिमालय की तरफ कूच करने लेना ताकि ऐसा देंह हिमालय में पिघल सके। जीवन को अनवरत बहने दो जैसे नदी अपने सम्पूर्ण आवेग में बहती है। बिना किसी रोक-टोक के जैसे सूर्य का स्वभाव है, तपन देना चन्द्रमा का स्वभाव शीतल है! ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी जो अपने स्वभाव में अपना जीवन जीना चाहता है। हां पर जो व्यक्ति अंहकार का नमक चख लेते हैं-उनकी जमात नेताओं में लम्बा पाया जाता है। दरअसल नेताओं को यह भ्रम हो जाता है कि जो हैं-हम-हैं, समूचा सृष्टि हमारे में आ के ठहरता है। जनता के हित में किये जाने वाले समस्त कार्य जब तक योजनाबद्ध तरीके से नही होंगे तो नेताओं का कार्यकाल गफ़लत में फंसेगा, और समाज व राष्ट्र भी गफ़लत में आ जायेगा।
आज पाईजी! सुबह-सुबह बड़ी तेजी के साथ कहीं चले जा रहे थे मालूम नही कहाँ जा रहे थे। अपितु इतने लम्बे-लम्बे पग ले रहे थे जैसे आज ही समूचे ब्रम्हांड का भ्रमण करके लौटेंगे। मैं बालकनी से पाईजी! को जाते देखा पाईजी! ने भी मुझे देखा पर आज नजरअंदाज किया और पाईजी! का नजरअंदाज मुझे सोचने पर विवश कर दिया। मैं बालकनी से सीढ़ियों के सहारे नीचे आया और पाईजी! के पीछे जाने लगा यह जानने के लिए की आखिर पाईजी! जा कहाँ रहे है। फिर देखा पाईजी! चलते-चलते कब्रस्तान की ओर मुड़ गए! मैं भी गया। पाईजी! कब्रस्तान की गेट के बाहर अपना चप्पल उतारा और दनदनाते हुए अंदर प्रवेश किया। मैं बड़ा चिंतित हुआ यह जान कर की ये पाईजी! यहां करने क्या आये है। फिर मैं झाड़ियों में छुपकर देखा की पाईजी! दोनों हाथ आसमान की ओर करके नीचे ले जाकर अंगूठे में छुआ रहे थे। मैं सोचा ये पाईजी! क्या कर रहे है, कुछ समझ नही आ रहा है। फिर थोड़ी देर बाद पाईजी! जो लगे चिल्लाने…कोई है…….सब ठीक-ठाक है…..किसी चीज की कमी तो नही है। तेज से पुनः खीझ कर चिल्लाया…..अरे ओ कोई है इस कब्रस्तान में? मैं दौड़ा पाईजी! की तरफ यह सोच कर की कहीं कोई अनर्थ न हो जाये! मैंने जाते ही पूंछा।
क्या बात है पाईजी! ये तुम क्या कर रहे हो? पाईजी! मेरी आवाज पाते ही शरीर मे एक कंपन हुआ पलट कर कहने लगें!
कविवर! आप और यहां आप मेरा पीछा कर रहे थे? वो तो मैं यूं ही योगासन आ कर रहा था। यह कहते हुए पाईजी! ने दांत निपोरा, पर मैं खीझा!
पाईजी! ये कौन सा योगासन है, जो सिर्फ कब्रस्तान में ही होता है। कोई है…….सब ठीक-ठाक है-ये कौन सा आसन था! बाबाराम देव ने कोई नया आसन लांच किया है, या फिर तुम भी उनका झंडू चवन्यप्राश खाने लगे हो। पाईजी! हंसते हुए बोले-
कविवर! मैं तो इस कब्रस्तान में देखने आया था कि जो ब्रांडिंग मुर्दे हैं, वो ठीक से सो रहे हैं या नही। उनको कोई दिक्कत तो नही है, अगर होगा तो नवागत सरकार से दरख्वास्त करेंगे कि कब्रस्तान के मुर्दो के लिए कोई योजना चलाई जाए जिसमे उन्हें कम्बल, तकिया, चादर और खाने के लिए ट्राई फूर्ड वगैरा समय-समय दिया जा सके।
पाईजी! अब तो मुझे शक नही यकीन है, तुम पागलपन की चरमसीमा पार कर चुके हो! तुमको मुर्दो से बात करने की जो लाइलाज बीमारी लगा है, न उसके लिए तुमको कहीं सरकार प्रशस्ति-पत्र न दे दे।
फिर पाईजी! ने एक दर्शन मोहनी मुस्कान दी और सवालों को काटे हुए कहने लगें।
अच्छा कविवर! आप ये बताइये ये जो 2019 में लोकसभा चुनाव के लिए सियासी अस्तबल से खच्चर छोड़े गये हैं, कहीं वो लम्बी रेस को घोड़े न बनके तो नही निकले। जब की ये तो मुरझाए हुए फूल है सुन्ध कैसे देंगे। इस पर आप क्या कहना चाहते हैं?
पाईजी! 2019 लोकसभा चुनाव के सम्पन्नता लिए ये जो असुर जागे है, और नए-नए लुभानें भाषण इजात कर रहे हैं। ये भाषण अब इतने नेताओं के जुबान से होकर गुजर आये हैं कि अब वो भाषण बूढ़े हो चले हैं। सियासी अस्तबल से जो खच्चर निकलेंगे उनके गले मे हाईकमान जनता को लुभानें के लिए जीएसटी, पेट्रोल-डीजल व खाद्य सामग्रियों में जबरदस्त गिरावट का तख़्ती लटका देंगे। और जनता इनकी संवेदनाओं में फिसल जाएगी। गलती जनमानस की नही वो तो इन सियासी असुरों के कार्यभार का बोझ जो मंहगाई के रूप में उठाते है, उससे कुछ राहत पाते है। इसलिए भी वो थोड़ा फिसल जाते हैं। और पाईजी! मुरझाया हुए गुलाब के फूल में सुन्ध लाने का काम चाणक्य के जमाने भी सम्भव नही हो सका चाणक्य की नीति भी मुरझाए हुए फूल में सुन्ध न ला सकी।-पाईजी! खिलखिलाते हुए बोले-
कविवर! आप ने सुना राहुल बाबा लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान में निकलने वाले हैं, अब कौन सी नई मुसीबत पार्टी के लिए खड़ी करेंगे।
अरे पाईजी! तुमको पता है, राहुल बाबा चलते फिरते एक मुसीबत है। प्रधानसेवक जी! अपने निजी जीवन से कम राहुल बाबा! के बयान से ज्यादा परेशान रहते हैं। आंख मारने में तो बाबा का कोई मुकाबला कर ही नही सकता। वैसे पाईजी! तुम देखना राहुल बाबा जहां-जहां जाएंगे जनता को आभार के रूप में एक-एक मशीन व दस-दस क्विंटल आलू वितरण करते जाएंगे। पाईजी! ठिठोली करते हुए बोले कविवर! आप है किस साइड-पाईजी मैं तो अपने ही साइड हूं-कविवर! ये कौन सा साइड होता है, अपने साइड? पाईजी! तुम नही समझोगे। पाईजी- सर में हाथ फेरते हुए बोले मुझे समझना भी नही है?
कविवर! राहुल बाबा ने जो ये प्रियंका गांधी के रूप में अपने जेब से हुकुम का एक्का निकाला है, यह तो सियासत की गलियारों में सन्नाटा बो दिया है।
पाईजी! ये जो राहुल बाबा ने दांव खेला है, यह विपक्षी दलों के लिए बहुत बड़ी मुसीबत है। प्रियंका गांधी के बढ़ते राजनीतिक कदम विपक्ष नही रो पायेगी क्यूंकि प्रियंका के रूप में पुनः इंद्रा की वापसी हुई है व प्रियंका का राजनीति में प्रवेश होने का मतलब साफ है कि देश मे बढ़ रहे जाति-धर्म व गाय-गोबर से ऊपर उठकर भी राजनीति किया जा सकता है। जहां अटल, राजीव, नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, इंद्रा जैसे प्रधानमंत्रियों के स्वर देश मे गूंजे हैं, और जनता इनमें अपना सुन्दर से भारत का स्वरूप देखता था। जो आज वही देश जाति और धर्म के बेशर्मी तुष्टीकरण में उलझ गया है। अब जनता भी अकुलाहट महसूस कर रही है। ये राजनीति के नए-नए पतवार प्रकृति के बनाये नियमों को व उनके रचनाओं को भगवा नही कर पा रहे हैं, नही तो वह भी आज भगवा होता।
कविवर! आप ये बताओ ये जो उद्योगपति व नेतागण बड़े-बड़े घोटाले करते हैं, ये कौन सी विधा के अंतर्गत आता है। कोयला से लेकर गायों का चारा-भूंसा तक नही छोड़ रहे हैं। बस गायों के गोबर बस बचें हैं।
पाईजी! तुम ये बताओ हम मनुष्यों की जरूरतें कब तक सीमित हैं, जब तक हम नेता नही बन जाते कुर्सी मिली शासकीय राजकोष खुला मिला भर लिए झोली में जितना मन हुआ। वैसे पाईजी! एक बात है, ये नेतागण न शायद शैतानों के उपासक होते है, सब नही वो नेता जो जनता के अधिकारों का गला घोंटते हैं। ऐसे नेता जन्म से आकर्षक व्यक्तित्व के होते हैं। इनका पेट हमारे व तुम्हारे जैसा ही होता है, बशर्ते ऐसे नेताओं का पेट पैसा खाता है; और हम अन्न खाते हैं। हम पानी पीते है, और वो गरीबों का खून पीते हैं। पाईजी! वैसे हम ऐसे घोटाले करने वाले नेताओं को आधुनिक युग का दानव भी कह दें तो कोई अतिसंयोक्ति पूर्ण बात नही होगा। आजादी के बाद भारतीय छोटा व मध्यमवर्गीय जन ही घोटालों से प्रभावित हुआ हैं। बड़े लोग जैसे उद्योगपतियों का कुछ हुआ नही हैं, वो तो केवल सत्ता का स्वाद लेते रहे हैं। अब देखना जल्द ही गोबर गणेश योजना चलने वाला है। जिसमे नेताओं के जनमानस के प्रति कार्यक्षमता शून्य होगा उस नेता को इस योजना से लाभान्वित कराया जाएगा। पाईजी! हसंते हुए बोले मतलब तब हद्द ही हो जायेगा।
अच्छा कविवर! जिन्हें भारत देश में सांस लेने व छोड़ने, मन मुताबिक रहने-घूमने और जब मन हो किसी को कुछ बोल देने की आजादी है। आज उन्हें देश असहिष्णु लग रहा है क्यूं?
पाईजी! इन सब चीजों में जीएसटी नही लगा है, जिस दिन लग जायेगा यही अपना सुन्दर से भारत सहिष्णु लगेगा। अब तो इस युगों के दानव तीन युगों के पश्चाताप करें। जो तीन युगों का बकाया है। पाईजी! दुष्यंत कुमार जी ने क्या खूब लिखा के कि-
तुम्हारे आभार की लिपि में प्रकाशित
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