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काल बनकर दौड़ रहे अनफिट वाहन परिवहन विभाग दिख रहा लाचार ,(आशुतोष सिंह की रिपोर्ट )

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इंट्रो-  सड़क पर कानून और नियमों को ताक मे रखकर दौड़ रहे है अनफिट वाहन। इन वाहनों पर कार्यवाही के मामले में परिवहन विभाग लाचार दिखाई देता है। बड़ी बात तो यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग से लेकर शहर में भी ये अनफिट वाहन लगातार दौड़ रहे है। जिन पर कोई कार्यवाही का न होना समझ के परे है। आंकड़े स्वयं इस बात को बयां कर रहे है कि अधिकारी इस मामले में बड़ी लापरवाही बरत रहे है।

अनूपपुर।

व्यवसायिक वाहनों की फिटनेस को लेकर बहुत से नियम जरूर बने है, फिटनेस जांच के समय इन वाहनों की हेडलाइट से लेकर रंग, बॉडी, इंजन, बैक लाइट और टायरों आदि की जांच की जाती है। साथ ही टेक्निकल जांच भी इस दौरान की जाती है। परिवहन विभाग में आरआई उनकी गैर मौजूदगी में एआरटीओ इस कार्य को करते है। जांच में देखा जाता है कि लाइट सही प्रकार से कार्य कर रही है या नहीं, टायर घिसे हुए तो नही है, बैक लाइट ठीक से जल रही है या नहीं और लाइट जलते समय कुछ रूकावट तो नहीं आ रही है। इसके अलावा कोई आल इंडिया परमिट ट्रक व कार का लेता है तब उक्त वाहन का रंग सफेद होना चाहिए जैसी जांच की जाती है। यदि सही से जांच की गई होती तब जिला की सड़कों पर बड़ी संख्या में अनफिट वाहन दौड़ते दिखाई नही पड़ते।

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बेरोकटोक दौड़ रहे वाहन

शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब जिले की सड़कों पर हादसा न होता हो। अधिकांश मामलों में जर्जर वाहन हादसों का षिकार होते है। वहीं वाहन मालिक व चालक हादसों से सबक न लेकर दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते है। नतीजतन ऐसे वाहन बेरोकटोक सड़कों पर दौड़ रहे हैं। अधिकांश वाहन मालिक एक बार फिटनेस कराने के बाद दोबारा प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं समझते। ट्रक व ट्रैक्टर-ट्राली क्षमता से अधिक सामान ढो रहे हैं। परिवहन विभाग इन पर कार्यवाही का दावा करता है, लेकिन धरातल पर इसका असर नजर नही आता। ट्रैक्टर-ट्राली व ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले जुगाड़ु वाहन हादसों का बड़ा कारण बनते हैं। ये ट्रालियां कहने को तो कृषि कार्य में प्रयोग हेतु पंजीयन होती हैं, लेकिन इनसे व्यवसायिक काम खुले आम लिए जाते हैं।

ट्रैक्टर-ट्राली के लिए है नियम

जनपद क्षेत्रों ट्रैक्टर-ट्राली के ऊपर ज्यादा कार्यवाही नहीं होती है, ट्रैक्टर-ट्राली का कृषि कार्य मे पंजीयन होने के बाद व्यवसायिक कार्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। बावजूद इन ट्रालियों का बड़े पैमाने पर व्यवसाय मे खुले आम इस्तेमाल हो रहा है। यहां तक कि ओवरलोड होकर ये सड़क पर दौड़ रही है। इनसे अब तक कई दुर्घटनाएं भी हो चुकी है। ट्रैक्टर चलाने के लिए अलग तरह का लायसेंस बनवाना होता है लेकिन अधिकांष ट्रेक्टर चालक या तो बिना लायसेंस के या लाइट मोटर व्हीकल लाइसेंस लिये बेखौफ होकर ट्रेक्टर दौड़ाते देखे जा सकते है। परिवहन विभाग के अधिकारी दावा करते है कि इन पर कार्रवाई बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है।

शहर के कई स्कूलों की बसें भी हैं कंडम

सड़क पर चलने वाली यात्री बसों के साथ ही स्कूलों द्वारा चलाई जाने वाली ज्यादातर बसें कंडम हो चुकी है। हाल ही में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह समपन्न हुआ, जहां परिवहन विभाग सिर्फ अपनी औपचारिकता निभाते दिखाई दिया, स्कूलों में खराब फिटनेस वाली बसों का संचालन किया जा रहा है, वहीं परिवहन विभाग का दावा है कि वे समय समय पर अनफिट वाहनों की जांच करते हैं। नियमानुसार इन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट जारी भी नहीं करते। यदि ऐसा है तो आखिर सड़कों पर इतनी मात्रा में अनफिट बसें व भारी वाहन कैसे दौड़ रही हैं। यह सवाल बना हुआ है।

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