# भारत में रिकार्ड ; एक ही दिन में मिले 26000 हजार से ज्यादा मामले ## भारत में कोरोना का कुल आकड़ा 822,603 # वहीँ 516,206 मरीज ठीक हुए,तो वहीँ 22,144 लोगों की हुई मौत # # भारत विश्व में कोरोना के चपेट में पंहुचा तीसरे नंबर पर ये बढ़ता आकड़ा, डराने वाला है # वही रिकवर मरीजों की संख्या भारत में बेहतर ##

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‘सियासत पर से उठता जनता का बगावती धुआँ..?’ (विशिष्ठ अथिति लेखक राजकमल पांडे)

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०चुनावी शोर-शराबे के बीच घर से निकलना बड़ा कठिन कार्य हो जाता है। क्यूँकि बुरे-से-बुरा राजनैतिक समर्थक मुँह से शहद टपकाते हुए कहीं-न-कहीं टकरा ही जाता है। और ऐसे लोग मेरे जैसे साधारण व्यक्ति की तलाश में ही रहते हैं, क्यूँकि गले पड़ने के सिवा उनके पास कोई काम नही रहता है। इस वजह से मेरे जैसा व्यक्ति घरों से बड़े हिसाब-किताब से निकलते हैं।
आज पाईजी! कई पार्टियों का अघोषित झंडा कंधे में रखकर घर-घर प्रचार-प्रसार कर रहे थे कि इस बार राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के प्रत्याशी न चुनकर एक मौका इन छोटे-मोटे ढुलमुल पार्टी के प्रत्याशियों को भी दें। और पाईजी! दूसरे घर पहुंचते ही झंडा बदलकर दूसरे प्रत्याशी के हक में वोट मांगने लगे। पाईजी! ने दो-चार समर्थक भी रखे थे जिन्हें पाईजी! गाइड कर रहे थे कि कहां झंडा-बैनर-पोस्टर बांधना-चिपकाना है। उन्हीं गलियों से गुजरते हुए मेरी निग़ाह पाईजी! पर पड़ा मैंने पाईजी! को आवाज दिया-ओ ‘पाईजी! मेरी आवाज सुनते ही दांतो में जीभ दबाते हुए, मन-ही-मन बुदबुदाया। ये कहां से आ गए कहते हुए कहा। नमस्कार कविवर! मैने कहा ये क्या आप तो कई पार्टियों का झंडा-बैनर-पोस्टर रखे हुए हैं व कई दलों के प्रत्याशी के लिए घर-घर प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अभी वहां गोंगपा वालों के लिए वोट मांगकर आये हो, और यहां लोजपा वालों का प्रचार कर रहे हो। प्रचार करना ही है, तो किसी एक दल का कीजिये न।’ पाईजी! मेरी तरफ बड़ा खीझकर बोले। ‘कविवर! आपके पास कोई काम-धाम तो है नही, तो इसका ये मतलब थोड़ी है कि सारी दुनिया निठल्ली है। आप ठहरे फकीर इंसान पर हमारे बीवी-बच्चों के भविष्य का सवाल है। हम जैसे लोगों के आगे कोई भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां घांस नही डालते है। इसलिए छोटे-मोटे पार्टी का प्रचार-प्रसार कर जीवन-यापन कर रहे हैं, तो करने दो-ज़नाब।’ आपका क्या आप तो वातानुकूलित कमरों से ट्विट-पोस्ट करके राजधर्म की परिभाषा बतलाते हैं। वैसे कविवर! आपको एक बात कहूँगा ये राजधर्म का ज्ञान भीष्मपितामह जी ने पहले ही दे दिया था, हां ये और बात है कि भीष्मपितामह जी के द्वारा दिया ज्ञान केवल ग्रंथ तक सीमित है, उसे धारण करने की जहमत किसी भी राजनेता में नही है। भीष्मपितामह जी मृत्यशैया पे पड़े-पड़े जो राजधर्म के पालन हेतु युद्धिष्ठिर को ज्ञान दिए थे। वह ज्ञान धर्मराज युद्धिष्ठिर तक ही रह गया। अपना राजपाठ सौपकर जब स्वर्गलोक को प्रस्थान किया, तो स्वर्ग में जिन्होंने राजधर्म का पालन नही किया था, वह भी स्वर्गलोक में कुछ दिनों तक के लिए स्वर्ग का सुख भोग रहे थे। और जिन दानवों का देंह हिमालय में पिघला था, आज उनका अज्ञान हवाओं में घुला हुआ है, जो सियासत में मिलकर दुर्गंध मार रहा है। तो अब आप राजधर्म की बात न करें तो ही अच्छा होगा। क्यूँकि आपको कोई सुनता-पढ़ता तो है, नही आप ख़ामोखा जज्बातों की नदी में बहे जा रहे हैं। जहाँ भी रहते हैं, वहाँ से बहुत जल्दी बागी हो जाते हो, आप की समस्या क्या है, वही सच्चाई-ईमानदारी। आज के परिवेश में इसका कोई मोल नही है, जहाँ पैसों के दम पर चुनाव सम्पन्न कराए जाते हो। पाईजी! के प्रतिउत्तर से मैं अपने आपको शून्य की स्थिति में ले गया। और बातों की दिशा बदलते हुए बोला-‘अच्छा पाईजी! तुम ये बताओ प्रत्याशियों को नामांकन दाखिल करवाने गए थे।’ पाईजी! नजदीक आये और कहने लगे ‘कविवर! गया तो था, बकायदा बैंड-बाजा के साथ। पर थोड़ा प्रत्याशियों को देख मन में संशय की स्थितियां उत्पन्न हो रही थी।’ मैं पाईजी, की तरफ सवाल लेकर बढ़ा तुम ऐसा क्यूँ कह रहे हो। पाईजी! बोले ‘कविवर! जिस प्रत्याशी को पिछली पंचवर्षीय में मोदी के घाट में देखा था, आज वो राहुल के घाट में डुबकी लगा रहे हैं। और जो कल राहुल के घाट में थे, वो आज मोदी के घाट पर डुबकी लगा रहे हैं। ये दल बदलने की फ़ितरत का माजरा क्या है।’ पहले तो मैं हिचकिचाया पर पाईजी! जिद्दी हैं, सवालों के जबाब जब-तक नही ले लेते तब-तब दम नही लेते। मैं बोला ‘पाईजी! ये दल बदलने का फ़ितरत कुर्सी की लालायितपना से है। उम्मीदवारी का दावा जो प्रत्याशी करता है, अगर उसके नाक तक यह गंध पहुँचा की इस बार हमारी पार्टी हमें टिकट नही दे रही है, तो वो स्तीफा बनाकर जेब में लिए घूमते हैं। पार्टी ने जैसे टिकट न देने को कहा। त्वरित ही जेब से खर्रा निकालते हुए पार्टी को अपना त्याग पत्र सौंप दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं। ऐसे नेताओं को न तो देश से मतलब होता है, और ना ही समाज व अपने प्रशंसकों से। उनकी इच्छा मात्र राजनीति में पद हासिल कर सत्ता का सुख प्राप्त करना व अपना पेट भरना है। फिर चाहे उनके क्षेत्र के समूचे जनमानस भूखें सोते हों।’ पाईजी! ने फिर एक सवाल किया बोले ‘कविवर! आप ये बताइये जब कांग्रेस ने तीन राज्यों मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़-राजस्थान में सरकार बनाकर दिखा दिया है, तो क्या केन्द्र में नही बना पाएंगे।’ पाईजी ने तो ऐसा सवाल किया जैसे किसी ने मुझे मिलावटी दूध वाला चाय ऑफर कर दिया हो, और मैं नकारते हुए नाक सिकोड़ रहा हूँ। ‘पाईजी! जो अभी विपक्ष में है, उनका माजरा समझ में नही आ रहा है कि अभी देश की अर्थव्यवस्था को किस स्तर तक लेकर जाने वाले हैं, ये सियासत के मठाधीश। क्यूँकि अभी तैरते हुए एक सूचना मिला है कि दिल्ली जो कि केन्द्र शासित प्रदेश है, वहां सीटों का बटवारा हो गया है। और शायद सरकार बनते ही पूर्व के भांति पूर्ण राज्य का दर्जा भी दिला देंगे। देश की जनता इन दिनों बड़ी असमंजस में है, किन्हें चुने और किसे हटा दें। और ये तीन राज्यों में से एक राज्य (राजस्थान) निकाल दो वहाँ की जनता हर पंचवर्षीय में सरकार बदल देते हैं। और रही बात मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ की तो ये दो राज्य सर्वण समाज ने पलट दिया है। ये कांग्रेस की जीत नही है।’ पाईजी! कहने लगे ये आप क्या बोल रहे हैं । हां पाईजी यही सर्वे रिपोर्ट कहता है। पाईजी ने मेरे बातों का समर्थन करते हुए एक नया सवालों का फ़िराक़ घोल दिया। बोले ‘कविवर! आप ये बताइये आजादी के 7 दशक में न जाने कितने सरकार बने व बिगड़े पर देश से गरीबी क्यूँ नही हटा।’ पाईजी! के सवाल हमेशा की तरह मूल रूप से धारण योग्य रहते हैं। मैं बोला ‘पाईजी! गरीबी जरूर नही हटा पर गरीब की परिभाषाएँ बदल दी गई। गरीब तबका आज देश का सबसे बड़ा चुनावी एजेन्डा है, इसी गरीबी-एजेन्डा के बलबूते कई सरकारें गिरी व बनी हैं। तुम ये मत समझो कि ये आज़ादी के सात दशक वाला देश है, और ना ही यहां नेहरूजी के बाद उनसे भी सफल राजनीतिज्ञकार श्री गुलजारीलाल नंदा वाले विचारों को धारण वाला देश बचा है। जिन्होंने देश के विकट परिस्थितियों में प्रधानमंत्री का कमान संभालकर देश को बिखरने नही दिया था। अब तो ये स्थितियां है कि जो भी नेता मंच से जितने जोरों का गरीबी हटाओ का नारा लगाएगा। उसकी सरकार उतने ही तीव्र गति से बनेगी।’ पाईजी! का मन मेरे प्रतिउत्तर से शांत हुआ और मुझसे क्षमा माँगते हुए बोले। ‘कविवर! मैंने आपको गुस्से-गुस्से में कुछ कहा हो तो माफ कीजियेगा।’ यह कहते हुए पाईजी! जाने लगे मैंने उन्हें रोका और कहा जब इतना बात हो गया है, तो मेरा एक शेर भी सुनते जाओ-
‘‘की ये सियासत से बगावत का धुआँ जो अभी कुछ घरों से उठ रहा है
देखना एक दिन घर-घर से निकला धुआँ पूरे देश पर न छा जाए तो कहना’’
-०राजकमल पांडे

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