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अब तक नहीं मिल सका मताधिकार ( आशुतोष सिंह की रिपोर्ट )

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15 वर्षों से जिले में रिफ्यूजी की तरह जी रहे जिंदगी

निर्वाचन आयोग की बड़ी चूक

मतदाता सूची में नाम न होने से मूलभूत सुविधा को तरसता जिले का एक कस्बा

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इंट्रो- अनुपपुर जिले के हरद गाँव मे रहने वाले एक तबके के लोगों का नाम निर्वाचन सूची में अब तक नही जोड़ा जा सका है। जिससे इन जनजाति के लोगो को जिंदगी जीने के लिए बड़ी मसक्कत करनी पड़ रही है। शिक्षा स्वास्थ्य जैसे मूल भूत सुविधाओं से वंचित रहकर जीवन यापन करने को मजबूर घुम्मकड़ और अर्ध घुमक्कड़ जनजातियों के लिए कहने को तो सरकार ने नियम कानून बनाये गए है। बावजूद उसके जमीनी हकीकत यहां कुछ अलग ही बयां करती दिखाई पड़ रही है।

15 वर्षो से जिले में रह रही जनजाति

बीते 15 वर्ष पहले जनजातियों के समूह गुजरात और राजस्थान से जीवकोपार्जन करने के लिए अनुपपुर जिले के एक गाँव हरद में आ बसा ये अर्ध घुमक्कड़ के रूप में यहां रहने लगे इन्हें यहाँ रहते हुये लगभग 15 वर्ष हो गये हैं। इन परिवारों की महिलाएं और छोटे बच्चे इस कस्बे मे स्थाई रुप से रहते हैं जबकि पुरुष जीवकोपार्जन के लिए इधर उधर घूमकर अपना व्यवसाय करते हैं। व्यवसाय से अर्जित धन से इनके परिवारों का भरण पोषण होता है। लेकिन समय पर पुरुष वर्ग वापस हरद गाँव अपने परिवार के पास रहने आ जाते हैं। पिछले 15 वर्षों से अब तक इन जनजातियों का नाम मतदाता सूची में नही जोड़ा गया है जबकि निर्वाचन आयोग हर वर्ष मतदाता सूची में नाम जोड़ने का सर्वे आदि कार्य करवाता है, और सर्वे कार्य को पूर्ण भी कर लिया जाना बताया जाता है। लेकिन हरद गांव मे निवास रत इन अर्ध घुमक्क्ड़ जनजाति के लोगो का नाम अब तक मतदाता सूची मे क्यों नही जोड़ा गया यह समझ के परे है।

हरद ग्राम के सरपंच ने भी नाम जुड़वाने का किया था प्रयास

हरद ग्राम के सरपंच सुरेंद्र सिंह ने बताया कि इन अर्धघुमक्कड़ जनजाति के लोगों का नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाए इसकी सूचना समय पर निर्वाचन शाखा के बीएलओ को ग्राम पंचायत के माध्यम से दी गई थी। लेकिन अब तक इनका नाम मतदाता सर्वे सूची में नही जोड़ा जा सका है। वास्तविक कारण की जानकारी ग्राम पंचायत को नही है किन्तु वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में कुछ लोगो का आधारकार्ड, और सामान्य राशन कार्ड पंचायत ने मुहैया कराया है। सरपंच सुरेन्द्र सिंह से मिली जानकारी अनुसार पर्याप्त सरकारी कागज इन जनजाति के लोगो केे पास नही होने से इनके बच्चे अब तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं से वंचित हैं।

अर्धघुमक्कड़ जनजातीय के लोगों की बात

ग्राम हरद मे रहने वाले अर्ध घुमक्कड़ जनजाति के लोगो से मिली जानकारी अनुसार वे लगभग विगत 15 वर्षो से हरद गाँव में झोपड़ पट्टी नुमा घरो पर रहते आ रहे हैं। कई बार इनके द्वारा मतदाता सूची मे नाम जुड़वाने का प्रयास किया गया किन्तु वह प्रयास सरकारी नियम कानून के सामने बौना ही रह गया। जिसका परिणाम मतदान करने का अधिकार से निवासरत इस जनजाति के लोगो को आज भी वंचित रखा है। साथ ही मूलभूत सुविधाओं का भी आभाव बना हुआ है। आलम यह है कि बिमारी से जूझते बृद्ध, अशिक्षित पीढ़ी, बिजली पानी जैसी सुविधा भी आज तक इन्हे नसीब नही हो सकी है। यदि सही समय पर इनका नाम मतदाता सूची मे जोड़ दिया जाता तो नरकीय जीवन से उद्धार के साथ मतदान जैसा अधिकार आज इस अर्ध घुमक्कड़ जाति के पास होता और देश के लिये सरकार चुनने मे इनका भी अपना योगदान होता।

टीबी जैसी बीमारी से जूझ रहा बुजुर्ग नही मिल रहा सरकारी इलाज

मतदाता सूची में नाम न होने से जहां एक ओर मताधिकार करने का इन्हे अधिकार प्राप्त नही है वहीं जिले मे निवास रत जनजाति को अन्य सुविधाओ की तरह स्वास्थ्य लाभ भी नही मिल पा रहा है। जिसका उदाहरण इस समूह मे रहने वाले टीबी जैसी बीमारी से ग्रसित अशोक सिंह के रुप मे देखने को मिल रहा है। पर्याप्त पैसे न होने के कारण अशोक की मदद आपस मे चंदा इक्कठे कर निजी स्वास्थ्य क्लिनिक से इलाज करा कर करते है। दूसरी तरफ सर्वे सूची में नाम नही होने से जच्चा बच्चा दोनों को स्वास्थ लाभ नही मिल पाता है। वहीं बारिश के दिनों में कीड़े मकोड़े सांप बिछुओ के बीच पन्नी से निर्मित झोपड़ियों में रहने को विवश जनजाति के लोग प्रशासनिक अमले की तरफ मदद के लिए टकटकी लगाए देख रहे हैं।

अनपढ़ होती तीसरी पीढ़ी

बच्चे बच्चियों से जब बात करते हुये उनसे पूछा गया क्या आप लोग पढ़ना चाहते हो…? तो सभी बच्चो ने एक स्वर में कहा हां हम पढ़ना चाहते है। लेकिन हमारा नाम स्कूल आंगनबाड़ी मे नही लिखा जा रहा है। इस वजह से हम स्कूल नही जा सकते। इस जनजाति की यह तीसरी पीढ़ी है जो अनपढ़ ही नही निरक्षर भी है। भारत के भविष्य कहे जाने वाले बच्चे इस जनजाति से भी पढ़ लिखकर आगे आ सकते है। किन्तु प्रशासनिक तंत्र को अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन करना पड़ेगा। यदि विगत 10 वर्ष पूर्व यह कार्य कर लिया गया होता तो सायद इस जनजाति मे पैदा हये तीसरी पीढ़ी के बच्चों को निरक्षर होने से बचाया जा सकता और दूसरी तरफ इन्हे बेहतर सुविधाये मिल सकती। किन्तु ऐसा कुछ भी नही हुआ है।

दोनो सरकारों के नुमाइंदो की नही पड़ी नजर

पूर्व सरकार में विमुक्त घुमक्कड़ और अर्धघुमक्कड़ जनजाति विकाश अभिकरण के पूर्व सदस्य नवल नायक ने बताया कि इनके लिये कई योजनाएं चलाई जाती हैं और निर्वाचन आयोग को समय रहते मतदाता सूची में इनका नाम जोड़ना चाहिए था। ताकि इन्हें समाज का अभिन्न अंग बनने का मौका मिल सके। निर्वाचन शाखा में पदस्त लापरवाह कर्मचारियों पर कार्यवाही करनी चाहिए इतने वर्ष के बाद भी इस समुदाय का नाम आखिर अब तक क्यों नही जोड़ा गया है ? इन जनजाति के लोगों के सामने सरकार चुनने के महाकुम्भ मे डुबकी लगाने का अवसर आज तक नही मिल सका। चाहे जिसकी भी रहे उसके चयन में भागीदार बनना अब भी मुश्किल ही बना हुआ है, और इधर सरकारी अमला अपनी ही पीठ थपथपाई करने में व्यस्त है।

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