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‘‘राजनीति पर आज ज़हालत (अज्ञान) हावी है,©राजकमल पांडे

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‘‘राजनीति पर आज ज़हालत (अज्ञान) हावी है,
पर अफ़सोस कोतमा विधायक को यक़ीन नही है..!’’ ©राजकमल पांडे…

आज़ादी के बाद सन् 1947 से भारत की राजनीति गिरते-सम्भलते रहा। और 60 से 80 के बीच में पूर्ण रूप से संभलना प्रारम्भ किया। प्रथम अभूतपूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू जी, का राजनैतिक कार्यकाल सराहनीय रहा। लगातार तीन बार प्रधानमंत्री रहे। उनके मृत्यु के बाद देश शोक संतप्त हो गया था। कांग्रेस पार्टी पर समर्पित गुलजारीलाल नंदा जी, ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला फिर दूसरी बार आचार्य लालबहादुर शास्त्री जी, के निधन के बाद भी गुलजारीलाल नंदा जी, को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। गुलजारीलाल जी, कई अलग-अलग विषयों के ज्ञानी थे व मुख्य रूप से अर्थशास्त्री भी थे। जब-जब उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पदभार दिया गया, उन्होंने हर स्थितियों पर देश को नए प्रधानमंत्री के आने तक सम्भाले रखा, देश व जनता को बिखरने नही दिया। उस पद पर तमाम महनीय से महनीय राजनीतिज्ञकारक आए-गए। पार्टी खड़ी की सदस्यों की संख्या बनाया। इंदिराजी, राजीवजी, अटलजी, मनमोहनजी आदि के सभी का अपना-अपना राजनैतिक कार्यकाल बेहतर रहा व अपने पद के सम्पूर्ण निर्वाहण किया। देश ठीक था-स्वस्थ था। इन तमाम राजनीतिज्ञकारो के ओजस्विता-विदुषिता देख। धीरे-धीरे गांव-शहर-राज्य व देश के घाट-घाट पर गाहे-बगाहे नेता उग आए, चोर-उचक्के-डांकू, माफ़िक, सटोरिया, असामाजिक लम्पट व कुछ महान शून्य की प्राथमिकता से नवाज गए अनपढ़ो की राजनैतिक पुतने तैयार होने लगे सामाजिकता-भाव, राष्ट्र पर सक्रियता, क्षेत्र व राजनीति पर समर्पण तथा शिक्षा का महत्व धीरे-धीरे भारतीय राजनीति से खत्म होते गया। और राजनीति कहां से उठकर कहां आ गिरा है?
आज बाजार का विचरण में पाईजी! को शामों-स़हर तलाश कर थका हारा घर में आकर माथे से पसीना पोंछते हुए बरामदे में बैठा ही था कि पाईजी के पद्चाप ने शरीर से थकान को बदन से उतरने पर विवश कर दिया। पाईजी! आते ही नमस्कार कविवर! कहते हुए वहीं बरामदे की सीढ़ी पर बैठ गए। मेरे माथे पर चिन्ता की लकीर देख पाईजी! संकोच बस पूंछ ही उठे-‘कविवर! क्षमा चाहूँगा क्या बात है, आपके माथे में ये चिन्ता की सिकुड़न कैसा। सदैव खिलखिलाता हुए चेहरा हाज़िर-जबाब कवि, के माथे में चिन्ता! शोभा नही देता है।’ पाईजी! चुनाव प्रचार करके लौटे थे, हाथ में झण्डा व डण्डा इसका सबूत था। और वहीं दीवाल पर झण्डा टिकाकर मेरी ओर सवाल लेकर बढ़े आ रहे थे। मैंने कहा-‘पाईजी! आज मैंने अनूपपुर-जिले की पत्रकारिता जगत् को लाँछन के कटघरों में देखा, ऐरा-ग़ैरा व्यक्ति पत्रकारिता के गिरेबान में हाथ डालकर आँख तरेर रहा है, पुरजोर कोशिश में हैं कि अनूपपुर-जिले के पत्रकारिता के आधार-स्तम्भ की नींव हिलाई जाए?’ पाईजी! ने पेट भर सांस खींचा और बोले आपके रहते? ‘कविवर! मुझे पता है आप अभी हाल ही में हुए एक घटना पर चिन्तित है, आपके पत्रकारिता छोड़ने की वजह तो नही पता और आपका योग्यदान अनूपपुर पत्रकारिता जगत् पर शून्य मानता हूँ! पर हां आपके पिताश्री का योग्यदान अनूपपुर के पत्रकारिता जगत् पर शून्य से शिखर तक का है। स्व.दलवीर सिंह, राजेश नंदिनी जैसे नेताओं को कलम से आईना दिखाया, तो वहीं शबनम मौसी जैसी पहली (किन्नर-विधायक) को राजनीति पर बोलना और अपनी कलम की धार से नेता बनाके निकाला था। मुझे उस वक्त बड़ा दुःख हुआ कविवर! जब आपको शबनम मौसी के विधायक बनाये जाने की सत्यता से गुमराह किया गया था, भास्कर राव रोकड़े जैसे पार्टी पर समर्पित कमल को श्रेय दिला दिया गया था। वो तो अच्छा हुआ आपने अध्ययन कर सच्चाई का पता लगा लिया व बगावत पर उतर आये। और आपके पिताश्री ने बिसाहुलाल सिंह जैसे अनगिनत नेता को सत्य के कटघरों में खड़कर कलम से आईना दिखाया। दिग्गिराजा जैसे नेता को अपने कलम की नोक पर नचा दिया था, और ये बात आपसे बेहतर कौन जानेगा। औरों से ज्यादा कम समय में आपने उनसे बहुत कुछ सीखा व बहुत कुछ जाना था। आपका इस तरह चिंताग्रस्त होना लाज़मी है। पर हां जो ऐसा करने में लगे हैं, वो अपने-अपने स्थान में मौजूद ईश्वर के प्राप्त विधा का त्याग कर रहे हैं। सब ठीक हो जाएगा, चिन्तित मत होइए।’ पाईजी मुझे झूठी दिलासा से बांधते हुए बोले-‘कविवर! ये कोतमा विधायक का बेतुका बयान तो आपने सुना ही होगा, क्या वो सच में मानसिक दिवालियापन की चरम सीमा लांघ चुके हैं, जो प्रदेश के मुखिया कमलनाथ के आगमन पर मुँह से शहद टपकाते हुए स्वागत कक्ष में खड़े थे। और बाद में मंच से अहंकार फ़रमाते हुए पत्रकारों को झोलाभर आईडी और सबको मैनेज होने का माइक पर उंगलियां ठोकते हुए मुँह से अतिसार बहाया।’ मैं जिस सवालों से बचकर ख़ामोश था, अनन्तः पाईजी! ने वही सुर छेड़ दिया। मैं बोला ‘पाईजी! मुझे सब पता है, मैं शांत इसलिए था कि खुद के स्वाभिमान की रक्षा पर कलम मयान से नही निकाला जाता है, ये कलम इतना सस्ता थोड़ी है कि जब मन हुआ निकाल लिए जब मन हुआ रख दिये। अगर उठे तो समाज, राष्ट्र व जनता के हित में भंजे ना की अपने स्वाभिमान की सुरक्षा और पार्टी भक्ति पर चले।’ पाईजी! बहुत देर तक खामोश हो गए और वहीं रखा पानी से भरा गिलास से पानी-पीने लगें। फिर बोल उठे-‘कविवर! कोतमा विधायक का पत्रकारों से वैमनस्य की कोई ख़ास वजह है।’ मैं बोला-‘पाईजी! आज वर्तमान की राजनीति इतनी सस्ती हो चुकी है कि महान-से-महान स्तरहीन व्यक्ति राजनीति का लबादा ओढ़े चौराहे गलियों में पान-गुटखा चगलाते हुए मिल जाएंगे। जनता बाजार से अनुपयोगी वस्तु खरीदकर भले कूड़ेदान में फेंकना पसन्द करते हैं, पर वर्तमान की राजनीतिक विचारधारा को न ओढ़ना चाहते और ना ही बिझाना चाहते चाहते हैं। मतलब साफ है कि कौड़ियों के भाव इसके दाम नही रहे। ऐसी ही राजनीति के कोख से जन्में स्वघोषित कोतमा नेता व विधायक हैं। उन्हें जो विधायकीय जीत मिला तो कुर्सी की फिसलन सम्भाला नही जा रहा है। प्रदेश के मुखिया के स्वरूप में खुद को भविष्य का सी.एम. समझ बैठे हैं। कोतमा विधायक के अहंकार का तेज इतना था कि मंच पर मुख से अतिसार बहाते-बहाते ही झुलस गए। ये अहंकार से लबालब देंह कोतमा विधायक को प्रदेश में सत्ता प्राप्ति का परिणाम है, जो कुछ नेताओं के मुँह में बबासीर करा दिया है। अगर समय रहते प्रदेश के मुखिया कोतमा विधायक के मुँह में हुए बबासीर पर सरकारी राजकोष से धन निकालकर चीरा नही लगवाते तो परिणामतः यह बीमारी सम्पूर्ण राज्य के नेताओं में फैलने की आशंका बढ़ा देगा।’ पाईजी ठहाका लगाते हुए बोले आप भी कविवर! इज्जत उतारने में माहिर हो बदन में रत्ती-भर का कपड़ा तो छोड़ दिया करिये! मैं बोला-‘पाईजी! जरूर एक बात और सुनो, कोतमा विधायक की कार्य गुजारी ऐसी है कि किसी ग्रामपंचायत का सरपंचीय चुनाव न जीते। पर कोतमा की जनता के भाग्यविधाता बन बैठे हैं। सब संयोग है, और राजयोग इसी को कहते है। जब राजयोग किसी के कुंडली पर आ जाए व जबानी सम्पूर्ण आवेग में हो तो फिर गदहे को भी राजा बनाकर छोड़ता है। भगवान श्रीकृष्ण जी, भी शिशुपाल की निन्यानबे गालियों तक मौन थे, सौवाँ पूर्ण होते ही सर-धड़ से अलग कर दिया था।’ पाईजी! उठ खड़े हुए और दोनों हाथ जोड़कर मेरी ओर सिर नवा दिये। मैंने कहा ‘पाईजी! बैठो व एक बात और सुनते जाओ और कोतमा विधायक मिले तो उन्हें बता जरूर देना की किसी ने क्या खूब कहा है कि ‘‘धूल है धूल को उड़ने दो बरसात आएगी तो चरणों मे ही गिरेगी?’’ तो कोतमा विधायक अगर तुमसे मिलें तो कहना कि ज़नाब आपको इस बात की तासीर हो कि साहित्य और साहित्य के कोख से जन्मा पत्रकारिता हमारा ताज है व उनकी राजनीति हमारे पैर की जूती है। जूती व जूती की धूल हमेशा पैरों के नीचे ही शोभायान होता है। और हां जो हमारा साहित्य और पत्रकारिता है, दोनों की कोख एक ही है। और दोनों हमारे सिर का ताज है। अगर कोई ताज पर हाथ लगाए तो कहियेगा कि हम तत्काल हाथ में धूल समेत जूती उठाकर दे मारते हैं।’ इसी पर मेरा एक शेर कोतमा विधायक को सुना देना कि-
सत्ता का सुख भोगन ख़ातिर
जनता के वोट का बलि चढ़ाकर आए
ज्ञान नही तुममें था रत्ती-भर का जो रहा
उसमें भी अहंकार का लेप लगवा आए..!
©राजकमल पांडे
पाईजी! हमेशा की तरह नमस्कार करते हुए ठहाकों का स्वर फोड़ा और चल दिये।

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