# मुख्यमंत्री सीएम शिवराज सिंह का हुआ आगमन ##

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सोए जो पंडित गाल बजाए… -0राजकमल पांडे0-

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बहुत दिनों बाद पाईजी ! से फिर मुलाकात हो गयी। अब शायद पाईजी, को बुढ़ापा आ रहा है। कमर झुक गयी है, बुढ़ापा अपने आप में चलता फिरता एक मर्ज है, और एक लाईलाज बिमारी। लाखों वैद्यों की दवा बेकार है, हजारों वैज्ञानिकों का रिसर्च फेल है। पर ससुरी क्यार बुढ़ापा आ ही जाता है। बुढ़ापा ऐसा मर्ज है, मानों कहीं से खटिया अपने आप चला आ रहा हो। पाईजी इनदिनों मोटर साइकिल चला नही पाते इसलिए कंधे में भोंपू लटकाए घूमते हैं। अभी तक पता नहीं था कि पाईजी, ऐसा भी शौक रखते है। आज पाईजी, चौराहे में खडे-खडे भोंपू बजा रहे थे, भोंपू की आवाज ऐसी थी। जैसे किसी अंजान रास्ते से कोई खोई हुए पेसेंजर ट्रेन चली आ रही हो। शाम ढ़ल रहा था, और रास्ता भी लम्बा है। पर पाईजी, को बुढ़ापे में लगा यह लाईलाज मर्ज भोंपू का आवाज तबियत खुश कर दिया। भोपूं की आवाज से मुझे प्रतीत हुए कि जैसे पटरियों पर दौड़ रहे ट्रेन से रेल्वे सरकार के कुर्सी की हवा निकल रही हो। पो……सिस्स्स्स्स्स्स…. वैसे दिल्ली लाल किला को डालमिया ग्रुप को ठेके पर देने के बाद केन्द्र सरकार भी चैन से सो नही पा रही है। रोजाना दिल्ली लालकिला केन्द्र सरकार के सपनों में आकर एक जोरदार कैय करता है, और चला जाता है। दिल्ली लालकिला के कैय से केन्द्र सरकार के कमरे में सडांध पैदा होने लगा है। उस कैय की सफाई में केन्द्र सरकार के करोडों खर्च हो रहे हैं। उसी कैयदार कमरें के एक कोने में गांधी जी, का चश्मा रखा है। जो सब कुछ देख रहे हैं, चश्में के दोनों तरफ कांच में लिख है स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत। और इधर 2019 के संसदीय चुनाव में सैकडों अपराधिक गतिविधि में संलग्न पुरोहित निर्वाचित हो गए, पूरे के पूरे चुनावी वैतरणी पार कर संसद में गूडी मार कर बैठ गए। किसी रात तो लगता बस अब दनादन कुछ चलने ही वाला है। यह द्रश्य सामने किसी सीनेमा घर से गुजरता हुआ फिल्म सा दिख रहा है, यही सोचते हुए मै धीरे से सरकते हुए पाईजी, के नजदीक पहुंचा और पूंछा क्या हुआ ‘‘पाईजी, यह क्या नया मर्ज लिए घूम रहे हो।’’ पाईजी, मुझे देखते ही आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे। ‘‘कविराज आप-नमस्कार ! हमें लगा यहां की राजनीतिक सक्रियता व प्रशासनिक चुस्ती ने आपको शहर से खदेड़ दिया है।’’ मै कई दिनों बाद दिल खोल के हंसा। ‘‘अरे नहीं पाईजी, मैं यहीं हूं कहां जाऊंगा कौन हमारे लिए अपने दरबाजे खोले हुए बैठा होगा, हमें लौट कर यहीं आना है। ‘‘हां-हां कविराज! किसी लेखक व कवि का वास्तविक जीवन कैसा होता है, यह आपको देख तथा समझकर मैंने महसूस किया है। मैंने पाईजी के बातों पर मिट्टी डालते हुए कहा ‘‘पर पाईजी, यह भोंपू किस खुशी में बजा रहे हो।’’ यह कहतें हुए वहीं चबूतरें पर बैठ गया। ‘‘कविराज मैं यह भोंपू राष्ट्रीय कोष के सुरक्षा हेतु बजा रहा हूं ताकि प्रशासनिक अमले व राजनैतिक धुरंधरों को यह ज्ञात हो कि शासकीय राजकोष की सुरक्षा पर हम तैनात हैं, जनता का खजाना यूं ही ना लुटने देंगे।’’ मै जोरदार ठहाकों के स्वर से पाईजी, का पीठ थपथपाया। और कहा ‘‘अरे पाईजी, अर्जित धन की सुरक्षा पर काले नाग पहले से बैठे हैं, इस भोंपू की आवाज पाकर कहीं भाग गए। तो ख़ामोख हमारी मुफ़्त में गिरफ़्तारी हो जायेगी। कहने लगे पाईजी और कविराज भोंपू बजाकर सांप भगा दिए और शासकीय राजकोष पर डांका पडवा दिया।’’ पाईजी, काफी सोच में पड़ गए और कहने लगे। ‘‘कविराज मैं यह भोपूं मोहल्ले के किसी कोने में बैठ के यह बजा सकता हूं- चलेगा। आपकी नामौजूदगी में मैं अपने पुराने धंधे में आ गया था, अब यह आदत आसानी से जाने वाला नही है।’’ मैंने कहा ‘‘पाईजी, इस भोंपू से अच्छा है, तुम गले में हारमोनियम लटका लो, चार पैसे भी मिलेंगे व टाइम भी कटेगा।’’ पाईजी तमतमाते हुए कहने लगे ‘‘कविराज आप मुझे भिखारी समझते हैं-क्या ? मैं बडे राज घराने से हूं, हमारे बाप-दादा सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए थे। वो पूर्वजों की आइयासी ने हमें कहीं का नहीं छोडा। मै तो आपको अपना मित्र मानता था, और आप तो मुझे गली का भिखारी समझ लिए।’’ मुझे लगा मेरे इस सुक्षाव से पाईजी, खुश होगे पर पाईजी, तो तमता उठे। मैंने कहा ‘‘नही-नही पाईजी, ऐसी बात नहीं है, मुझे लगा वर्तमान सरकार की फैलाई हुई बेराजगारी से असमय बुढ़ापे की चपेट में आ गए हो, तों सोंचा कोई काम-धाम कर लो। हो सकता है, आराम व चैंन पाकर जवानी लौट आए। पाईजी, कहने लगे ‘‘कविराज अगर बुढ़ापा आने के बाद वापस जवानी लौट जाती, तो यह नेता सैलूनों में जाकर लाइन ना लगाकर खडे होते। इन नेताओं के बालों पर लगने वाले खिज़ाब का खर्चा भी हम निम्न व मध्यम वर्ग के लोगों को उठाना पड़ता है। उनके बच्चों के डाइपर व नेताओं के बीवी, बच्चों के महंगे शौक का बोझ तो 72 बरस से ढो ही रहे हैं।’’ पाईजी आज इस कदर वार्तालाप कर रहे थे, जैसे दो कोई अंजान व्यक्ति बात कर रहे हों। मैने कहा ‘‘पाईजी, इतना खीझकर बात क्यूं कर रहे हो। इतने दिनों बाद मिलों हो या फिर तुम्हें समझें वाला जहां में मुझसा दूसरा कोई नहीं मिला इसलिए । यह कहते हुए मै रूक गया। पाईजी, पुनः भाव तरेरकर कहने लगे ‘‘कविराज मुझे मेरे हाल में छोड दों, बड़ा परेशान हूं नगरपालिका वाले मुझे गरीब मान नहीं रहे प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पालिका के चक्का लगा रहा हूं। आज तक मुझे किसी भी शासकीय योजना से लाभान्वित नहीं किया गया है। जैसे मैं इस शहर का हूं नही।’’ पाईजी, के कपाल की नशे तमतमाए हुए था। मैने कहां ‘‘अरे पाईजी, सरकार की सारी योजना नेताओं और अधिकारियों जोत के लिए होती हैं, उससे कुछ बचा तो हम जैसे गरीबों का मिलता है। अब तुम कुर्ता फाडकर चौराहे में खड़े होकर चिल्लाओगे कि मैं गरीब हूं सरकार मुझे गरीबों की सूची में डाले।’’ पाईजी कहने लगे फिर तो ‘‘कविराज इस हिसाब से देश में गरीब है ही नही, सारी गरीबधारी योजना नेताओं और अधिकारियों के लिए है। सोसायटी का सारा गल्ला, गोदामों में सड़ रहा है, गरीब पेट पकड़ मर रहे हैं। सरकारी सियार चिल्ला रहे हैं गरीबी हटाओं-गरीबी हटाओ यह नहीं कहते कि हम गरीबों का हिस्सा खा लिए इसलिए गरीब अब बचे नहीं।’’ पाईजी, हमेशा बात दमदार करते हैं मैने कहा ‘‘पाईजी, केन्द्र सरकार के कमरों से जो विकास के लम्बें-लम्बे पग निकलते हैं, वह जनमानस तक पहुंचते-पहुंचते कब बौने हो जाते हैं; किसी को पता ही नहीं चलता। विकास की धार नेताओं के मुंह से जितनी तेजी से निकलती है, वह उतनी ही तेजी से उन्हीं तक सिमटकर रह जाती है। पर हां जब गरीबों का झंन्नाटेदार तमाचा मत के रूप से पड़ता है, तो सियासत के बड़े-बडे राजनैतिक धुरंधर औंधे मुंह गिरते हैं। पाईजी, पूरी तैयारी के साथ राजनीति का झुनझुना बजाओ और सितार छेडते रहो। क्यूंकि चुनाव नजदीक आयेगा, तो तैयारी तुम्हें ही करनी है कि सरकार किसकी बनानी है, चौराहों-गलियों में तुम्हें पोस्टर चस्पा करना है। किसी से तुम्हें यह मतलब थोड़ी ना रहता है कि पोस्टर कौन पढ़ता है या कौन पढ़ चुका है। यह ख्याल दिमाग से निकालकर ना तुम नेताओं के लिए पोस्टर चस्पा करते हो। सत्ता की जो टूटन है, वह जनता के तमाचे से ही जाना है। अब सम पर गर्दन को झटका देने के वे जमाने गये। पाईजी, मेरी बातों को बडे ध्यान से सुन रहे थे, और बात खत्म होते ही बोले-‘‘कविराज लगता है कि आप इस बार पूरी तैयारी से आए हो। और बहुत चोट खाए हुए मालूम पड़ते हैं, अच्छा आप यह बताइए क्या हम कभी वह सरकार बना सकते हैं, जो सिर्फ देश के उन्नति की बात करे।’’ पाईजी आज एकदम रोबोट की तरह प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे थे, मैने कहा। ‘‘पाईजी, सरकार बनते ही है गरीबों के उत्थान व देश के उन्नति के लिए पर अफसोस की बात यह है कि सरकार के गैर नियुक्त एजेन्ट देश की उन्नति का सारा धन अपने मटके जैसे पेट में समेट लेते हैं। और रही बात देश से गरीबी हटने कि तो जिस दिन देश से गरीबी हटी उस दिन देश से सरकार भी हट जायेगी। सरकार बनाई ही इसलिए जाती है, ताकि देश से गरीबी हटे बस गरीबी हटाने की प्रथा को सात दशक में सम्बल नही मिल सका है। बांकि सरकार तो कितनी आई और कितनी गईं भी। अच्छा पाईजी, सबसे ज्यादा देश के डाक्टर परेशान हैं कि यह मोटापा कम क्यूं नहीं हो रहा है। डॉक्टर जिस दिन यह पता लगा लिए कि मोटापे की असल वजह गरीबों का हिस्सा डकारने से है; तो उस दिन देश के सारे अस्पतालों में ताले लटक जायेंगे। वर्गना इतनी मजाल सरकार में नहीं है कि गरीबों का हिस्सा अकेले खाकर डकार ढंग ले सके। सरकार का हजामा बिगड़ जायेगा, सुबह से कैय वह दस्त प्रारम्भ हो जायेगा।’’ पाईजी, मुस्कुराते हुए बोले-‘‘कविराज आप इतने प्रश्नों के प्रत्युत्तर लाते कहां से हो।’’ मैने कहां ‘‘पाईजी, तुम परेशान इसलिए हो कि मुझे तुम्हारे प्रश्नों के प्रत्युत्तर मिलते कहां से हैं, यह कभी नहीं सोचते हो कि मैं रात को सोता कैसे हूं। सरकार की तरह उल्टा टांग करके या अंधेर गलियों में कुत्ते हांक कर।’’ पाईजी, केंद्र सरकार का हाल सोए जो पंडित गाल बजाए जैसा है। पाईजी, दोनो हाथों की थपोलियों को मिलाते हुए ठहाका देकर हंसने लगे। और कहने लगे ‘‘कविराज आज आपने कोई शेर नहीं सुनाया’’ यह कहते हुए पाईजी, ने मुझे रोक लिया। मैने कहा अच्छा तो सुना दुष्यंत कुमार जी, का शेर है कि-
‘‘ सामान कुछ नहीं है फटे.हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है’’

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