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“व्यंग” विकास से संवाद हां मैं विकास हु राजकमल पांडेय (आजाद)

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“व्यंग” (विकास से संवाद)

         “हां मैं विकास हूं”

                  राजकमल पांडे (आज़ाद)    

     

  रात की घड़ी में जब 12 बजते हैं, तो मुझे मेरे पुस्तकालय के कमरे चीख-चीख कर बुलाते है। और कहते है-“कहां हो लेखक महोदय! आज कुछ लिखना पढ़ना नही होगा क्या ? मेरे पुस्तकालय के कमरे में जो रात के सन्नाटे में प्रवेश कर ले तो मेरे पुस्तकों की आवाज से उनके कान के पर्दे फट जाएं। जब रात में देश, शहर और गांव में एक तरह की खामोशी छा जाती है, तो मैं उस सन्नाटे को अपनी कलम में समेट कर लिखता हूँ।
         आज सुबह-सुबह घर से निकला तो महसूस किया कि शहर में एक तरह का सन्नाटा पसरा हुआ था, मैं भी कुछ न सोचते हुए, हवा और वादियों से गुफ्तगू करते हुए चौराहे तक पहुँचा। चौराहे में एक मजमा लगा था, शायद चुनावी मजमा हो। उस मजमे में शहर का विकास भी शामिल था। मुझे देखते ही आवाज लगाया-“ओ लेखक महोदय!” मैं चकित होकर यहां-वहां देखने लगा। फिर उसने आवाज लगाया और कहा यहां-वहां क्या देख रहें हैं, नीचे देखिए मैं हूँ-“इस शहर का विकास ?” ये मेरा भाई बजबजाता हुआ नाला और वो रेल्वे फाटक मेरे बड़े पापा। आइये लेखक महोदय! मैं आपको शहर के उन विकास के सदस्यों से मिलवाता हूं, जिनके बलबूते नेता और सियासतदार कुर्सी में विराजमान होते है? ये देखिए यह है, सब्जी मंडी मेरी मां, ये है मांस बाजार मेरा बाप, ये है बस स्टैंड मेरी बहन और ये मैं हूं छाती में फैला अतिक्रमण ? अच्छा विकास जी! तुम ये बताओ कि तुम जीते कैसे हो? अरे लेखक महोदय! मै विकास हूँ मै सब में जी लेता हूँ, कभी कलेक्टर के चेम्बर में सो जाता हूँ तो कभी नेताओ के जुबां में घर बसा लेता हूँ, तो कभी चुनावी घोषणा-पत्र में समाहित हो जाता हूं। परिस्थितियां चाहे जो हो, अपितु मैं जीता हूँ ? मैंने कितने फ़कीर नेताओ को राजा बना दिया, कितने अफसरों को पी.एम-सीएम का सलाहकार बना दिया। और साथ ही मैंने कितनो बेईमान आला अफसरों की कोठरी भर दी-“क्योंकि मैं विकास हूँ।” अच्छा विकास जी तुम थे कहां इतने दिन -“कुछ मत पूछिए लेखक महोदय! मै बहुत परेशान हूँ, सरकार का फरमान जैसे आता है, मुझे उस पर अमल होने जाना पड़ता है, बहुत जगह तो मैं नेताओ और अफसरों की कार्यगुजारी की वजह से नही पहुंच पाता हूँ।
       लेखक महोदय! मैं 14 बरस से इस अनूपपुर शहर के गलियों में विचरण कर रहा हूँ, कहीं भी मिल जाता हूँ। जहां चाहे वहां मैं कभी प्रधानमंत्री आवास योजना बन जाता हूँ, तो कभी घर-घर शौचालय के निर्माण में शामिल हो जाता हूं, नाली, नर्दे, सड़क, बिजली, पानी और तो और सरकार जो राशनकार्ड में गरीबो को मोतीं बांटती है, मैं वहां भी मिल जाता हूँ। बस मुझे इंतजार था तो इस नगरपालिका चुनाव का अभी इसमे बड़ा व्यस्त हूँ। इससे खाली हुआ तो फिर विधानसभा इसके बाद लोकसभा? हां एक बात और मै आज विधायक जी! के साथ ग्राम छातापटपर गया था, बिजली बिल माफ होना था, और मैं ठहरा विकास जहां सरकार का फरमान होता है, मुझे जाना पड़ता है उस पर अमल होने ? चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता है, तो मैं काफी व्यस्त हो जाता हूँ और चुनाव समाप्त होते ही मैं अपनी मांद तलाशी में जुट जाता हूँ-“जब तक जरूरत रहता है, मैं नेताओ की जुबां में सैर करता हूँ।” आगामी चुनाव आने तक ? अरे विकास जी! तुम्हारा अगला दौरा कहां का है,-“लेखक महोदय! अगला मत पूछिए कहां का हो जाए हो सकता है मुझे हर पंचवर्षीय की भांति इस बार अनूपपुर नगरपालिका चुनाव में पार्षदों और अध्यक्षो के साथ जाना पड़े। वैसे पार्षद मेरी चर्चा नही करते है, अध्यक्षो के मुकाबले क्योंकि अध्यक्ष तभी जीतेगा जब वो मेरी चर्चा करेगा मतलब “विकास की” उसे भी ज्यादा तो विधायक और सांसद करते है। क्योंकि विधायक और सांसद तभी जीत सकते है, जब मुझे अपने चुनावी घोषणा-पत्र में ज्यादा से ज्यादा समाहित करेंगे। अन्यथा हार सुनिश्चित है ? लेखक महोदय इसमे सबसे अहम बात ये है कि अगर विधायक बना तो उसकी दौड़ मुख्यमंत्री तक और सांसद बना तो प्रधानमंत्री तक और ये तभी संभव है, जब मेरे साथ नेता कदम से कदम मिलाकर चलेंगे। अपितु लेखक महोदय! ऐसा होता बहुत कम नेतागण मेरे साथ चुनाव तक ही कदम मिला पाते है, चुनाव समाप्त होते ही और कुर्सी में पसरते ही कदम बहक जाते है, और मैं 5 साल के लिए डस्टबीन में चला जाता हूँ। लेखक महोदय! जब ये शहर कस्बा था, तो मैं इस कस्बे की दिल मे जीता था, जिला बना तो मैं बड़ी उत्सुकता से जागा-इस उम्मीद से की चलो अब अपनी बारी आ गई है, चौराहे-गलियों में चस्पा होने का। लेकिन सरकार के द्वारा पदस्थ किए गए आलाकमान व जनप्रतिनिधियों ने मेरी दुर्दशा ही बिगाड़ दी मुझे स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। और मैं नेताओ और अफसरों के भ्रष्टाचार का शिकार हो बैठा और मैं लतफत पड़ा रहा।
        विकास जी! तुमने जो इस शहर के प्रति अपना दर्द बयां किया है, मैं समझ सकता हूँ। अरे…अरे….लेखक महोदय आप ये क्या कह रहे हैं, कहीं आप भी तो चुनाव नही लड़ना चाहते है। मै ठहाके लगाकर हंसने लगा। अरे नही विकास जी मैं तुम्हारा बोझ नही उठा पाउँगा तुम्हारा बोझ उठाने के लिए कोई सशक्त नेता की जरूरत है। और मैं ठहरा सरफिरा इंसान चुनौतियों से लड़ने वाला घुमक्कड़ लेखक हूँ? लेखक महोदय! आप ये बताइये मैं बड़े शांति से जीता हूँ, कभी हल्ला नही करता मैं सब मे शामिल हो जाता हूँ, फिर चाहे वह पार्टी भाजपा,कांग्रेस, सपा या फिर गोंडवाना ही क्यों न हो फिर मेरे साथ ये भ्रष्टाचार क्यों होता है ? अरे विकास जी! तुम इस शहर की नही पूरे राष्ट्र की शान हो, घोषणाओं की आन हो, नेताओ की जान हो तुम्हारी कोई संज्ञा नही है, अपितु तुम पार्टीदारो  की महबूबा हो ? अगर नेताओ को कुर्सी चाहिए तो तुम्हारे बांह में बांह डालकर चलना ही होगा नही तो नेता औंधे मुंह गिरेंगे। और जब तुम नेताओं को अपने बलबूते कुर्सी दिला देते हो, तो तुम राष्ट्रद्रोही हो जाते हो तुम बगावत पे उतर कर जनता के आवाज में शामिल हो जाते हो। हां लेखक महोदय! आपने सही कहा। मेरा हाल तो उस गुलाम अली के संगीत जैसा हो गया है कि
चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है, ये शहर कहते है।
यहां पर है, हजारो घर-घरों में लोग रहते,
मुझे इस शहर के गलियों का बंजारा बना डाला।
चमकते चांद को टूटा हुआ…..!
       अच्छा लेखक महोदय! मुझे जाना होगा, चुनावी घोषणा-पत्र मेरा इंतजार कर रहा होगा।
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