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देश के लिये अबूझे रहे गाँधी जी के तीन बन्दर (वरिस्ठ पत्रकार मनोज दुवेदी की कलम से)

सत्य के लिये सबूतों की तलाश करता भारत...

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अनूपपुर / भारत की स्वतंत्रता के बाद देश की जनता तथा राजनैतिक दलों के बीच एक समझ विकसित हुई कि एक दूसरे की कही – अनकही सब समझ ली जाए । यह समझ उन तीन बन्दरों की मुख मुद्रा की तरह रही है, जो इशारों के माध्यम से एक आदर्श समाज की रचना करते दिखते तो हैं लेकिन सवालिया निशान के साथ। आरोप हैं कि इसकी मनचाही व्याख्या करते हुए , उसका मनचाहा उपयोग किया गया।
*** पता नहीं कब , किसने यह कह दिया कि वो तीनों बन्दर गांधी जी के थे । यह स्पष्ट नहीं कि इसमें कोई सच्चाई है या महज कथा की तरह प्रचारित की गयी। जनता के मन में ये सवाल जरुर उठे कि यदि ये बन्दर सचमुच गाँधी जी के थे तो आंख, कान, मुंह बन्द करने की व्याख्या क्या वही है, जो हमें बतलाई जाती रही है ? यदि हां ! तो उसका उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाले समाज के आचरण में यह सब दिखता क्यों नहीं ? अहिंसक गांधी के देश में 80 वर्ष के निहत्थे संत को पालघर की अराजक गुण्डों की भीड़ पुलिस के सामने घंटो तब तक पीटती रही ,जब तक कि उनका दम नहीं निकल गया। तब गांधी की अहिंसा ने वहीं दम तोड दिया। कोरोना संक्रमण के बीच इलाज के लिये अपनी जान हथेली पर लेकर काम करते डाक्टर्स, नर्सों ,स्वच्छता दूतों, सुरक्षा बलों पर पथराव / हमले की हिंसक गतिविधियों के बीच तीन बन्दरों की निष्क्रियता यहाँ गांधी जी के सत्य से प्रयोग करती रही। बन्दरों ने देश – दुनिया को संदेश दिया कि कुछ भी ना देखो , कुछ भी ना कहो एवं कुछ भी ना सुनो।
*** बन्दर भले ही एक नकलची प्राणी है लेकिन वह भी अच्छे – बुरे का भेद करके ही दूसरों की नकल करता है। गांधी जी के अनुयायियों ने बकरी पालन किया , ना कि भेंड । लेकिन उनके नाम पर दशकों राज करने वालों ने बकरी की जगह भेंड पालना शुरु कर दिया। भेंडों की चाल, उनकी गति उनके विवेक शून्य होने पर निर्भर होती है। विवेकशून्य भेंडों में आज भी कोई दिशा नहीं है। बन्दर पालने का अनुशरण केवल मदारियों ने किया । जो उसके गले पर अनुशासन का पट्टा बांध कर जनता के बीच नाचने, मनोरंजन करने के लिये प्रयोग करते रहे । डिजिटल युग में बन्दर – बन्दरिया के अभिनय से जनता ऊब चुकी है। इसलिये जब जनता ने भाव देना बन्द कर दिया तो उसने अजीबोगरीब हरकतें कर तोडफोड शुरु कर दिया ।
तब जनता की समझ में भी यह आ गया कि वो तीन बन्दर गाँधी जी के थे ही नहीं । बन्दरों को गांधीनामी डाल कर गांधीवादी नहीं बनाया जा सकता।
*** देश बचपन से मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी की तरह , गांधी जी के तीन बन्दर पढता, सुनता आ रहा है। । कभी किसी सच्चे गांधीवादी ने बन्दर- कथा की पुष्टि नहीं की इसलिए तीन बन्दरों का रहस्य आज भी बना हुआ है। तीन बन्दरों में से एक ने अपना हाथ अपने मुंह पर, दूसरे ने अपनी आंखों पर तथा तीसरे ने अपने कानों पर दे रखा है। जिसका अर्थ यही बतलाया गया कि बुरा मत कहो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो । लोकतंत्र के लिये अच्छा होता कि एक चौथा बन्दर भी इनके साथ होता । जिसके हाथ मे लाठी या कलम होता तो कम से कम वह इन
बन्दरों को अनुशासन की निगरानी में तो रखता ।
*** दुर्भाग्य है कि जिस बन्दर ने कान बन्द किया था…उसने अन्याय के विरुद्ध देखना – बोलना तक उचित नहीं समझा। जिस बन्दर ने मुंह बन्द किया हुआ था…उसने भ्रष्टाचार, निकम्मेपन,अराजकता को खुली आंखों से देखने – कानों से सुनने की आदत नहीं डाली। जिस बन्दर की आंखे बन्द थीं , वह खुले कानों से सच्चाई सुन सकता था …लेकिन उसने गरीब, मजबूर को सुनने – बोलने तक से मना कर दिया । इन तीन निकम्मे , षडयंत्रकारी बन्दरों की सांठ गांठ ने समूचे देश को तबाह कर दिया। अंधे , गूंगे, बहरे बन्दरों के देश में सबूतों, गवाहों का अकाल पड गया। समर्थ का कोई दोष ही नहीं रहा । गरीब की बातें ,उनके दुख ना सुनने, ना देखने, ना कहने की सख्त हिदायत दी गयी।
*** सवाल है कि अंधे, बहरे, गूंगे बन्दरों का देश बना भारत कब तक इनका बोझ ढोता रहे। बुद्धिजीवियों की किसी टोली ने बन्दरों की इस अराजकता के विरुद्ध अपने तमगे, अपने पुरुस्कार सरकार को क्यों नहीं लौटाए ? सवाल उठना लाजिमी है कि आजादी के बाद अहिंसावादी, अनुशासित , शान्ति प्रिय गांधी जी के नाम पर उनकी विचारधारा के प्रतीक ये बन्दर कैसे बन गये ? भारत इतने वर्षों तक इन नकली गांधीवादी बन्दरों की साजिश का शिकार कैसे होता रहा ?
*** सत्तर साल तक देश को गांधी जी के तीन बन्दरों की शिक्षा दी गयी । सच्चाई तो यही है कि बन्दरों के माध्यम से आम जनता को यही सिखलाया जाता रहा कि बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो। लेकिन देश को हांकने की सनक लिये फर्जी गाँधीवाद ने , सच्चे गांधीवाद का मजाक बना डाला। उनके नाम की महानता को ओढ कर राजनीति तो की…लेकिन उनकी शिक्षा से कोई नाता नहीं रखा। स्वदेशी की पताका लहरा कर विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाले सच्चे गाँधीवादियों को बन्दरों के मुंह, आंख, कान पर से हाथ हटाना होगा। सच्ची गांधीवादी शिक्षा यही सिखलाती है कि सत्य से आंखे ना फेरो , अत्यचार पर चुप मत रहो तथा देश के विरुद्ध साजिशों के प्रति कान खुले रखो। जब जनता आंख, कान,मुंह का सही प्रयोग जान जाएगी तो सत्य का सही प्रयोग होगा ।

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