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पलायन….इक्कीसवीं सदी की सबसे बडी त्रासदी (वरिस्ठ पत्रकार मनोज दुवेदी की कलम से)

मजबूत राष्ट्रनिर्माण के लिये जिम्मेदारी एवं अनुशासन जरुरी

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इक्कीसवीं सदी में कोविड-१९ वायरस के संक्रमण से फैली महामारी के बाद भारत में लाकडाऊन के दौरान श्रमिकों के बेरोजगार हो जाने के बाद भूखों मरने के डर से शुरु हुआ घर वापसी का महा अभियान देश की दूसरी सबसे बडी त्रासदी बन कर सामने आया है। यह सरकारों की सबसे बडी विफलता है कि लाकडाऊन के दॊरान इन मजदूरों, उनके परिवार की ठोस जिम्मेदारी तय ना करके इन्हे राज्यों के बूते छोड दिया गया। राज्यों की सरकारें भी इन मजदूरों को भोजन, राशन ,सुरक्षा देने में नाकाम रही हैं। राज्य सरकारों की लापरवाही का बडा परिणाम है मजदूरों का पलायन । यदि मजदूर अपनी , अपने परिवार के सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होते तो शायद वो इतना बडा खतरा ना उठाते। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया में प्रतिदिन हो रही रिपोर्टिंग सडकों पर पैदल हजारों किमी की यात्रा पर निकले इन श्रमिकों की पीड़ा, इनकी परेशानियों , इनके आंसुओं से भरी पडी हैं। घर प्रवास पर निकले ये लाखों लोग आने वाले दिनों में देश में कोरोना से जूझती सरकार तथा देश पर बहुत भारी पडने वाले हैं। बिना समुचित स्वास्थ्य परीक्षण के भूखे प्यासे तन – मन लिये इन श्रमिकों का सुरक्षित घर पहुंचना तथा आगे भी सुरक्षित रहना ….अन्य लोगों को सुरक्षित बनाए रखना बडी चुनौती होगी। इनके साथ कुछ तो ज्यादती तो हुई है….लाकडाऊन के पूर्व केन्द्र की गाईड लाईन थी कि जो जहाँ हैं,वहीं रहें। दूसरे दिन दिल्ली से घर वापसी की इच्छा लिये हजारों लोगों की भीड जो सडकों पर उतरी …वैसा ही पलायन अन्य राज्यों से शुरू हुआ जो आज भी बन्द नहीं हुआ है। काम के आभाव में बेरोजगार हुए लोग कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी की तमाम आशंकाओं को छोड कर, भूख के भय से लगभग सभी राज्यों में सोशल डिस्टेशिंग की धज्जियां उडाते दिखे। जत्थे के जत्थे…समूह के समूह में लोग पैदल, सायकिल, ट्रक, टैंकर के माध्यम से भगवान भरोसे हजारों किमी की यात्रा करने निकल पड़े । यह सिर्फ श्रमिकों की मजबूरी नहीं थी। यह उन तमाम राज्यों, जिला प्रशासन की संवेदनशीलता , उनकी लोककल्याणकारी होने के दावों के विपरीत बडी विफलता थी। #श्रमिक यदि कंपनियों के बन्द होने से बेरोजगार हुए तो यह आशंका केन्द्र तथा राज्य सरकारों को पहले से जरुर रही होगी। बेरोजगार श्रमिकों के भोजन, पानी, आवास की चिंता कम्पनियों, सरकारों को करना था, जो समय रहते नहीं किया गया। जब लोगों को दो – दो , चार – चार दिन खाना नहीं मिला तो उनके सब्र ने जवाब दे दिया। राज्य सरकारें एक माह भी इन श्रमिकों को संभाल नहीं सकीं। उल्टे कुछ राज्यों पर इन्हे जबरन अन्य राज्यों में खदेडने जैसी स्थिति देखी गयी। कुछ स्थानों पर थोडी गलती श्रमिकों की भी दिखी। प्रतिवर्ष काम की तलाश मे घर छोडकर हजारों किमी दूर जाते वक्त जोखिम का अहसास इन्हे जरुर रहता होगा । लाकडाऊन कोरोना महामारी से करोड़ो लोगों को बचाने के लिये उठाया गया अति आवश्यक सामूहिक निर्णय था। जिसमे समाज के प्रत्येक वर्ग का सहयोग अपेक्षित था। समाज के लगभग प्रत्येक वर्ग ने कष्ट सह कर भी इस निर्णय के प्रति सहभागिता निभाई है । यह जीवन बचाने का अभियान था, जिसमे श्रमिकों से भी सहयोग की अपेक्षा की गयी। लेकिन धैर्य छोड कर, सडकों पर भीड के रुप मे बाहर आकर बडी चोट पहुंचाई गयी। रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों, अन्य शहरों को पलायन मजबूरी मे लिया गया निर्णय होता है। घर से बाहर निकलने पर इसके साथ तमाम तरह के जोखिम जुडे होते हैं। जिससे बचाव की तैयारी भी रखनी होती है। कोरोना महामारी के वैश्विक संकटकाल मे जोखिम से बचाव की यह तैयारी नहीं दिखी। देश को यह अहसास हुआ कि मजदूरों का जीवन भगवान के भरोसे तथा सरकारी मदद की आस पर टिका हुआ है। अन्य शहरों, राज्यों में कार्यरत श्रमिक बन्धुओं को यह समझना होगा कि कोरोना संक्रमण एक वैश्विक समस्या है। वे घर से बाहर परदेश मे परेशान थे। लेकिन जो अपने गांव – घर में हैं, वो भी उतने ही परेशान हैं। लेकिन उन्होंने हडबडा कर अनुशासन / व्यवस्था नहीं तोडा। देश के प्रत्येक शहर , कस्बे , गांव में नाई, दर्जी, मोची, पंडित, समाचार पत्र घर – घर बांटने वाले हाकर, छोटे – मझोले पत्रकार , किसान, आटो – टैक्सी चलाने वाले , प्लंबर, हाकर….किसे आभाव एवं परेशानी नहीं हुई है ? श्रमिकों को काम नही मिल रहा …डेढ माह से छोटे सब्जी उत्पादक, भिक्षुक, ट्यूशन पढाने वाले, कूरियर ब्वाय, सेल्स गर्ल्स सबको कोई ना कोई दिक्कत है । इसका यह मतलब तो कदापि नहीं कि धैर्य खो कर स्वयं के लिये बड़ी समस्या मोल ले ली जाए। पलायन एक बडा दर्द है। इसे नजदीक से देखें तो प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक नयी कहानी जुडी हुई है। दर्द इतना है कि आंसुओं के सैलाब में इंसान बह जाए। संवेदनशीलता एवं संवेदनहीनता दोनो के प्रत्यक्ष दर्शन एक साथ हो रहे हैं। कहीं लोग संवेदन शून्य हैं…जिसके कारण लोग परेशान हो रहे हैं । तो बहुत जगह राहत के हर प्रबंध किये जा रहे हैं। कोई भोजन के लिये लंगर खोले है , तो कोई पानी , बिस्किट, जूते बांट रहा है। ऐसा नहीं कि भारत सिर्फ सडकों पर आभाव झेल रहा है। देश उनकी भी चिंता कर रहा है जो डेढ माह से घरों मे आभाव का जीवन जी रहे हैं। बच्चे, परिवार, गृहस्थी कंधे पर , सिर पर टांगे पैदल सैकडों , हजारों किमी की यात्रा भूखे प्यासे लोगों को करते देखना इक्कीसवीं सदी की सबसे भयावह घटना है‌ । गरीबी, भूख, अशिक्षा, नासमझी, विवेकशून्यता, बेरोजगारी….. राजनीति तथा टी आर पी के प्रिय विषय रहे हैं। जब तक इन्हे बेचारगी से हटा कर अधिकार तथा नियम कायदों की परिधि में नहीं लाया जाएगा, तब तक कुटिल राजनीति के कंधो पर सवार टी आर पी के कैमरों को खुराक मिलती रहेगी। प्रवास के मामलों में कुछ तो इनकी मजबूरी है , तो कुछ मामलों में धैर्य, समझ, अनुशासन की कमी लापरवाही का बडा कारण बन कर सामने आया है। तीन से पांच हजार रुपये देकर ट्रकों , बसों, टैंकरों में भूसे की तरह भर कर यात्रा करते देखना दुखद है…तो बैल की तरह एक व्यक्ति को बैलगाड़ी मे गर्भवती पत्नी को ले जाते देखना अत्यंत दुखद। रेलवे ट्रैक पर कट कर जान गंवाने वाले जनजातीय समाज के बन्धुओं का मामला हो या सडकों पर दुर्घटना मे मरते लोगों की खबरें। भूखे – प्यासे , नंगे पैर – बिना चप्पल जूतों के यात्रा करते लोग हों या सडक किनारे रात्रि विश्राम को रुके लोगों के पैरों के छालों से निकलता मवाद । जिस – जिस रास्ते , गांव, शहर, जिले ,राज्यों की सीमाओं को पार करके इन्होने मजबूरी भरी यात्राएं की हैं ….वहाँ के सरपंच, सचिव, नपा – निगम परिषद , जिला प्रशासन, राज्य सरकारों, सांसद – विधायकों , समाजसेवियों की संवेदनशीलता , उनके कर्तव्य परायणता , उनकी चेतना पर गंभीर सवाल हैं। घरों को प्रवास करते इन श्रमिकों के कारण आने वाले दिनों में उनके गृह जिलों मे कोरोना संक्रमण का खतरा बढा सकता है। अन्य राज्यों से वापस आए लोगों में कोरोना पाजिटिव निकलने से इनके परिजनो, मित्रों को लेकर चिन्ताए बढी हैं , साथ ही गांव मे तनाव भी । इन्हे स्थानीय स्तर पर रोजगार देने की अतिरिक्त चिंता भी सरकार को करनी होगी। लाकडाऊन समाप्त होने पर कार्यस्थल पर इनकी वापसी एक बडी चुनौती होगी। देश की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिये यह आवश्यक है कि फैक्ट्रियों कंपनियों मे काम शुरु हो। इसके लिये श्रमिकों की दरकार होगी।  केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, जिला प्रशासन , कंपनियों एवं उनके श्रमिकों को 2020 के लाकडाऊन पलायन से गंभीर सबक लेकर मजबूत तथा स्थायी व्यवस्था पर कार्य करना होगा। भविष्य मे ऐसी किसी दशा मे सामूहिक पलायन की अराजकता ना हो, इसकी जवाबदेही तय करना होगा। भारत विश्व की बडी आर्थिक महाशक्ति बनने की योजना पर कार्य कर रहा है। अनुशासन, समर्पण तथा मजदूरों के हित – लाभ को मजबूत किये बिना जवाबदेही की अपेक्षा नहीं की जा सकती । बिना नागरिकों व तंत्र के जवाबदेह बनें कोई राष्ट्र मजबूत नहीं हो सकता।

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